उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुलायम सिंह यादव का उभार 1970 के दशक के बाद हुआ था, जानिए-नेताजी का राजनीतिक सफर

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समाचार सच, यूपी/लखनऊ। समाजवादी पार्टी (सपा) के संस्थापक मुलायम सिंह यादव का कई दिन आईसीयू में रहने के बाद सोमवार को गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में निधन हो गया। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने ट्विटर पर अपने पिता के निधन की पुष्टि की है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुलायम सिंह यादव का उभार 1970 के दशक के बाद के तीव्र सामाजिक और राजनीतिक उथल-पुथल के बीच हुआ था।

अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) ने तब यूपी में राजनीतिक प्रभुत्व हासिल करना शुरू कर दिया था। कथित उच्च जाति के नेताओं के वर्चस्व वाली कांग्रेस पार्टी को दरकिनार कर दिया गया था। एक समाजवादी नेता के रूप में उभरे मुलायम सिंह यादव ने जल्द ही खुद को एक ओबीसी दिग्गज के रूप में स्थापित किया और कांग्रेस के अवसान से खाली हुए राजनीतिक स्थान पर कब्जा कर लिया। उन्होंने 1989 में यूपी के 15वें सीएम के रूप में शपथ ली, उसके बाद से आज तक राज्य की सत्ता कांग्रेस के पास नहीं गई है। मुलायम सिंह यादव तीन बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे।
1989 के विधानसभा चुनाव के बाद मुलायम पहली बार भाजपा के बाहरी समर्थन से मुख्यमंत्री बने। 1993 में सपा नेता के रूप में दूसरी बार मुख्यमंत्री बने, इस बार उन्हें कांशीराम के नेतृत्व वाली बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का समर्थन हासिल था। 2003 में वह तीसरी बार सपा के नेतृत्व वाले गठबंधन के नेता के रूप में मुख्यमंत्री बने। उनके तीनों कार्यकाल की कुल अवधि करीब छह साल और 9 महीने थी।
पहलवान से शिक्षक बने मुलायम का जन्म 22 नवंबर, 1939 को इटावा में हुआ था। उनके पास एमए (राजनीति विज्ञान) और बी.एड की डिग्री थी। वह 1967 में पहली बार संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के रूप में इटावा के जसवंतनगर से विधायक चुने गए थे। हालांकि 1969 के चुनाव में कांग्रेस के विशंभर सिंह यादव से हार गए थे।
1974 के मध्यवर्ती चुनाव से पहले मुलायम सिंह चौधरी चरण सिंह के भारतीय क्रांति दल (ठज्ञक्) में शामिल हो गए थे। उन्होंने ठज्ञक् के टिकट पर जसवंतनगर सीट से चुनाव लड़ा और जीता। साल 1977 में उन्होंने जनता पार्टी के टिकट पर जसवंतनगर सीट को फिर से जीता। 1970 के दशक के अंत में वह राम नरेश यादव सरकार में सहकारिता और पशुपालन मंत्री भी बने।
1980 के चुनावों में जब कांग्रेस ने वापसी की तो मुलायम अपनी सीट बलराम सिंह यादव ( कांग्रेस नेता) से हार गए। बाद में वह लोकदल में गए और राज्य विधान परिषद के उम्मीदवार के रूप में चुने गए। 1985 के विधानसभा चुनाव में मुलायम जसवंतनगर से लोकदल के टिकट पर चुने गए और विपक्ष के नेता बने।
1989 में 10वीं यूपी विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले मुलायम सिंह वीपी सिंह के नेतृत्व वाले जनता दल में शामिल हो गए। उन्हें यूपी इकाई का प्रमुख नियुक्त किया गया। प्रमुख विपक्षी चेहरे के रूप में उभरने के बाद उन्होंने राज्यव्यापी क्रांति रथ यात्रा शुरू की। उनकी रैलियों में एक थीम गीत बजता था, “नाम मुलायम सिंह है, लेकिन काम बड़ा फौलादी है।
इस चुनाव में जनता दल 421 सीटों में से 208 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी थी। हालांकि यह संख्या बहुमत के जादुई आंकड़े से कम था। भाजपा को 57 और बसपा को 13 सीटों पर जीत मिली थी। मुलायम सिंह यादव एक बार फिर जसवंतनगर से चुने गए थे। उन्होंने 5 दिसंबर 1989 को मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी।
नवंबर 1990 में जब जनता दल वीपी सिंह और चंद्रशेखर के नेतृत्व में दो गुटों में बंटा, तो कांग्रेस ने केंद्र में चंद्रशेखर सरकार और यूपी में मुलायम सिंह सरकार का समर्थन किया। बाद में कांग्रेस ने दोनों सरकारों से समर्थन खींच लिया, जिसके कारण यूपी और केंद्र में नए सिरे से चुनाव हुए।
साल 1992 में मुलायम सिंह यादव ने ‘समाजवादी पार्टी’ के नाम से नई पार्टी की स्थापना की। 1993 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 176, सपा ने 108 और बसपा ने 68 सीटों पर जीत हासिल की थी। मुलायम शिकोहाबाद, जसवंतनगर और निधौलीकलां से चुनाव लड़े और तीनों सीटों से जीते थे। भाजपा ने सबसे बड़ी पार्टी के रूप में सरकार बनाने का दावा पेश किया। वहीं मुलायम ने सभी गैर-भाजपा दलों और कुछ निर्दलीय विधायकों को मिलाकर 242 सदस्यों के समर्थन का दावा किया।
बसपा की मदद से मुलायम दूसरी बार 4 दिसंबर, 1993 को मुख्यमंत्री बने। 29 जनवरी, 1995 को कांग्रेस ने इस सरकार से समर्थन वापस ले लिया। 1 जून 1995 को बसपा ने भी सरकार से नाता तोड़ लिया। राज्यपाल मोतीलाल वोरा ने मुलायम से इस्तीफा देने को कहा, लेकिन उन्होंने ऐसा करने से इनकार कर दिया। 3 जून 1995 को वोरा ने मुलायम सरकार को बर्खास्त कर दिया।
2002 के विधानसभा चुनाव में किसी पार्टी को बहुमत नहीं मिली। बसपा ने भाजपा के साथ गठबंधन कर सरकार बनाई। मायावती मुख्यमंत्री बनीं। हालांकि अगस्त 2003 में मायावती ने इस्तीफा दे दिया और इस तरह मुलायम सिंह यादव को तीसरी बार सीएम के रूप में शपथ लेने का मौका मिला।
मुख्यमंत्री के रूप में अपने पहले कार्यकाल के दौरान मुलायम ने विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे एससी/एसटी/ओबीसी उम्मीदवारों के लिए कोचिंग योजना सहित उनके सशक्तिकरण के लिए कई योजनाओं की शुरुआत की थी।
अपनी दूसरी सरकार में मुलायम ने मंडल आयोग की रिपोर्ट के आधार पर ओबीसी आरक्षण को 15 फीसदी से बढ़ाकर 27 फीसदी किया था। उन्होंने त्रिस्तरीय पंचायत राज संस्थाओं में विभिन्न सामाजिक श्रेणियों के लिए कोटा सुनिश्चित किया था। हालांकि वह अपराधियों को बचाने और अपने परिवार के सदस्यों को राजनीति में बढ़ावा देने के आरोपों से परेशान रहे।
उन्होंने गैर-यादव ओबीसी जातियों को भी लुभाने का प्रयास किया, लेकिन अपने उरूज के वक्त उन्हें यादवों और मुसलमानों का नेता माना गया। अपने सामाजिक आधार का विस्तार करने के लिए उन्होंने कथित उच्च-जाति के कुछ समुदायों, विशेषकर ठाकुरों को अपनी तरफ करने की कोशिश की।
मुख्यमंत्री के रूप में अपने तीसरे कार्यकाल के दौरान वह अपने सहयोगी अमर सिंह से खूब प्रभावित दिखे। सिंह ने ही मुलायम और उनकी पार्टी को कॉर्पाेरेट और फिल्मी हलकों से जोड़ा। 2012 के विधानसभा चुनाव में जब सपा ने बहुमत हासिल किया और अपनी सरकार बनाई, तो मुलायम ने अपने बेटे अखिलेश यादव को नेतृत्व की कमान सौंप दी।
1996 के लोकसभा चुनाव में मुलायम सिंह यादव पहली बार सांसद चुने गए। वह एचडी देवेगौड़ा और बाद में आईके गुजराल के नेतृत्व वाली संयुक्त मोर्चा सरकारों में रक्षा मंत्री रहे।

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