रानीखेत कॉलेज में बना ‘ऑक्सीजन बैंक’! 100 पेड़ों का सघन वन तैयार करने की पहल, 4-5 साल में दिखेगा असर

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समाचार सच, रानीखेत। पर्यावरण संरक्षण और हरित क्षेत्र बढ़ाने की दिशा में राजकीय डिग्री कॉलेज रानीखेत में 12 अगस्त 2026 को वृहद पौधारोपण अभियान चलाया गया। कॉलेज परिसर में इससे पहले जुलाई माह में भी बड़ी संख्या में पौधे लगाए गए थे। अब परिसर की एक खाली भूमि पर 100 पेड़ों का सघन वन तैयार करने की पहल की जा रही है।

कार्यक्रम में पूर्व जिला आयुर्वेद अधिकारी एवं पर्यावरणविद डॉ. आशुतोष पंत ने पौधारोपण में सहभागिता की। उन्होंने कॉलेज के प्रधानाचार्य डॉ. पुष्पेश पांडे का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि उनके सहयोग से कॉलेज परिसर में पौधारोपण और सघन वन तैयार करने का अवसर मिला।

पौधारोपण अभियान में NCC कैडेट्स ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। इस दौरान कॉलेज के शिक्षक डॉ. पीएन तिवारी, डॉ. प्राची जोशी, NCC प्रभारी डॉ. लक्ष्मी, कॉलेज स्टाफ के कृपाल एवं उपाध्याय, डॉ. जगदीश सती और वाहन चालक ललित धारियाल का भी सहयोग रहा।

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मियावाकी विधि से तैयार होगा सघन वन
डॉ. पंत ने बताया कि सघन वन तैयार करने की तकनीक जापानी वैज्ञानिक डॉ. अकीरा मियावाकी से जुड़ी है। इस पद्धति में पौधों को सामान्य पौधरोपण की तुलना में काफी कम दूरी पर लगाया जाता है। पेड़ों के बीच प्रकाश के लिए प्रतिस्पर्धा होने के कारण वे तेजी से ऊंचाई की ओर बढ़ते हैं।

उन्होंने बताया कि सामान्य परिस्थितियों में जिस वन को तैयार होने में 15 से 20 वर्ष लग सकते हैं, मियावाकी पद्धति से लगाए गए सघन वन को लगभग 4 से 5 वर्षों में विकसित किया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि सघन वन केवल हरियाली बढ़ाने तक सीमित नहीं है। अधिक पेड़ होने से स्थानीय तापमान कम रखने, जैव विविधता बढ़ाने तथा तितलियों, भौरों और पक्षियों को अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराने में मदद मिल सकती है।

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कम जमीन में भी बन सकता है सघन वन
डॉ. पंत ने बताया कि सघन वन तैयार करने के लिए बहुत बड़े भू-भाग की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने अब तक करीब 15 सघन वन तैयार किए हैं, जिनमें दो आधा बीघा से भी कम भूमि पर विकसित किए गए हैं।

उन्होंने स्कूलों और संस्थाओं से अपील की कि यदि वे अपने परिसर में सघन वन विकसित करना चाहते हैं तो उनसे संपर्क कर सकते हैं। उनके अनुसार पौधे और तकनीकी सहायता निशुल्क उपलब्ध कराई जाएगी। इसके लिए परिसर का चारदीवारी से सुरक्षित होना जरूरी है, ताकि पशु पौधों को नुकसान न पहुंचा सकें। शुरुआती करीब दो वर्षों तक सिंचाई की व्यवस्था भी करनी होगी।

उन्होंने कहा कि उचित देखभाल के बाद 3 से 5 वर्षों में परिसर में एक घना वन तैयार किया जा सकता है, जो पर्यावरण संरक्षण और पारिस्थितिकी का एक उपयोगी मॉडल बन सकता है।

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