पद्मिनी एकादशी 2026: अधिकमास या पुरुषोत्तम मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को ‘पद्मिनी एकादशी’, के रूप में मनाई जाती है, जानिए व्रत रखने के नियम

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समाचार सच, अध्यात्म डेस्क। ज्येष्ठ अधिकमास या पुरुषोत्तम मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को ‘पद्मिनी एकादशी’ कहा जाता है। चूंकि अधिकमास हर तीन साल में एक बार आता है, इसलिए इस एकादशी का महत्व बाकी सभी एकादशियों से कहीं अधिक माना गया है। यह एकादशी ज्येष्ठ मास या पुरुषोत्तम मास में आती है, जो धार्मिक दृष्टि से अत्यंत शुभ होता है। यह समय धार्मिक अनुष्ठानों का माना गया है, अतरू इस दिन की गई पूजा और दान का फल सभी प्रकार के पापों से मुक्ति दिलाता है।

आइए जानते हैं पद्मिनी एकादशी की 5 खास बातें और इस व्रत को रखने के 5 कड़े नियम-
पद्मिनी एकादशी की खास बातें
तीन साल में एक बार आने वाला दुर्लभ महाव्रत

यह एकादशी हर साल नहीं आती। यह केवल अधिकमास (मलमास) में ही आती है, जो तीन साल के अंतराल पर पड़ता है। इस वजह से इस व्रत को करने का अवसर बेहद भाग्य से मिलता है।

स्वयं श्रीहरि ने बताया इसका महत्व
पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को इस व्रत की महिमा बताते हुए कहा था कि जो पुण्य सभी यज्ञों, तपस्याओं और तीर्थ यात्राओं से नहीं मिलता, वह अकेले पद्मिनी एकादशी का व्रत रखने से मिल जाता है।

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मनोकामना पूर्ति और राजयोग की प्राप्ति
इस व्रत को करने से व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। प्राचीन काल में कार्तवीर्य अर्जुन (सहस्रार्जुन) के माता-पिता ने संतान प्राप्ति के लिए यह व्रत किया था, जिसके प्रभाव से उन्हें अत्यंत शक्तिशाली पुत्र की प्राप्ति हुई थी।

बैकुंठ लोक की प्राप्ति
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पद्मिनी एकादशी का व्रत करने वाले साधक के जीवन के सभी पाप धुल जाते हैं और मृत्यु के बाद उसे सीधे विष्णु लोक (बैकुंठ) में स्थान मिलता है।

महालक्ष्मी की विशेष कृपा
अधिकमास के स्वामी भगवान विष्णु हैं। इस दिन विष्णु जी के साथ माता लक्ष्मी का विशेष पूजन करने से घर की दरिद्रता हमेशा के लिए समाप्त हो जाती है और आर्थिक संकट दूर होते हैं।

पद्मिनी एकादशी व्रत के 5 जरूरी नियम
पद्मिनी एकादशी का व्रत अन्य एकादशियों की तुलना में थोड़ा कठिन होता है और इसके नियमों का कड़ाई से पालन करना अनिवार्य है-

दशमी तिथि से ही संयम (शुरुआत)
व्रत के नियम दशमी तिथि यानी एकादशी के एक दिन पहले की रात से ही शुरू हो जाते हैं। दशमी की रात को कांसे के बर्तन में भोजन नहीं करना चाहिए और मांस, मदिरा, मसूर की दाल, प्याज-लहसुन जैसे तामसिक भोजन से पूरी तरह दूरी बना लेनी चाहिए।

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निर्जला या फलाहार का नियम
यह व्रत अत्यंत पवित्र है। सामर्थ्य के अनुसार इसे निर्जला अर्थात् बिना पानी के या फलाहार यानी केवल फल और पानी रखकर किया जाता है। व्रत के दिन अन्न जैसे- चावल, गेहूं आदि का सेवन पूरी तरह वर्जित है।

रात्रि जागरण और कीर्तन
पद्मिनी एकादशी की रात को सोना नहीं चाहिए। इस रात भगवान विष्णु की मूर्ति या तस्वीर के सामने दीपक जलाकर रात्रि जागरण करना चाहिए और विष्णु सहस्रनाम का पाठ या भजन-कीर्तन करना चाहिए।

अखंड शांत और सात्विक व्यवहार
व्रत के दिन किसी की निंदा या चुगली न करें, झूठ न बोलें और क्रोध करने से बचें। ब्रह्मचर्य का पूर्ण पालन करें और मन को पूरी तरह भगवान के चरणों में लगाएं।

द्वादशी को पारण का सही तरीका
व्रत का पारण यानी व्रत खोलने का कार्य अगले दिन द्वादशी तिथि को शुभ मुहूर्त में ही करें। पारण करने से पहले ब्राह्मणों या किसी जरूरतमंद को भोजन कराएं, दान-दक्षिणा दें और उसके बाद ही स्वयं तुलसी दल और जल ग्रहण करके व्रत खोलें।

विशेष मंत्र: इस दिन ‘‘ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय’’ मंत्र का मानसिक जाप करते रहने से व्रत का फल कई गुना बढ़ जाता है।

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