पुस्तकालयों की शिक्षा के प्रचार प्रसार में रही महत्वपूर्ण भूमिका : राज्यपाल

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समाचार सच, देहरादून। राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह (से नि) ने कहा कि पुस्तकालयो मे भारत के प्राचीन ज्ञान-विज्ञान, वेदो, उपनिषद्, ग्रन्थों, संस्कृति और सभ्यता का डॉक्यूमेंटेशन किया जाए तथा लाइब्रेरी हमारी प्राचीन ज्ञान-विज्ञान, सभ्यता और संस्कृति के संरक्षण का केन्द्र बने। लाइब्रेरीज हमारी प्राचीन भारतीय संस्कृति व ज्ञान-विज्ञान के आर्काइव हाउस के रूप में स्थापित हो। लाइब्रेरीज के माध्यम से नई पीढ़ी को प्राचीन ज्ञान-विज्ञान से अवगत कराया जा सकेगा। हमारे प्राचीन ग्रन्थों और साहित्य को संरक्षित करने के लिये इनका डिजिटलाइजेशन किया जाना भी अति आवश्यक है। हमें इंफॉर्मेशन सिक्योरिटी का भी ध्यान रखना होगा, ताकि हमारी विरासत का ज्ञान नष्ट ना हो जाए। राज्यपाल ने कहा कि पुस्तकालय शैक्षणिक लोकतंत्र है। हमारे पुस्तकालय अपनी सामाजिक और शैक्षणिक उत्तरदायित्व प्रभावी ढंग से निभा रहे हैं। राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह (सेनि) ने सोमवार को दिल्ली विश्वविद्यालय के पुस्तकालय तथा सूचना विज्ञान विभाग द्वारा दिल्ली विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में आयोजित “75 वां आजादी का अमृत महोत्सव तथा पुस्तकालय एवं सूचना विज्ञान विभाग का शैक्षिक उत्कर्ष का उत्सव“ में बतौर मुख्य अतिथि प्रतिभाग किया।

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कार्यक्रम को संबोधित करते हुए राज्यपाल ने कहा कि पुस्तकालयों की शिक्षा के प्रचार प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका रही है। हमारे पुस्तकालय ज्ञान और सूचनाओं के विशाल भंडार है। सूचनाओं ओर ज्ञान की आवश्यकता सिर्फ विद्यार्थियों को नही है। प्रशासक, मैनेजर, उद्यमी, पर्यटक, पत्रकार, शोधकर्ता, यहां तक कि किसानों, कारखानों और खेतों में काम करने वाले श्रमिकों तथा आम नागरिकों को भी अपनी जरूरतों के अनुसार सूचनाओं और जानकारी की आवश्यकता होती है। आज इंटरनेट, डिजिटलाइजेशन और मोबाइल कल्चर के युग में सूचनाएं और ज्ञान हमारे फिंगर टिप्स पर हर वक्त मौजूद है, परन्तु पुस्तकालयों का महत्व कही भी कम नही हुआ है। युवाओं से अपील है कि पुस्तके पढ़ने की आदत डालें। अच्छी पुस्तकें आपकी मित्र, मार्गदर्शक, गुरू तथा अभिभावक सभी कुछ हो सकती है। पुस्तके आपको ज्ञान देने के साथ ही आपके चरित्र निर्माण और आत्मविश्वास बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाती है। उपहार स्वरूप एक दूसरे को पुस्तके भेंट करें। राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह (से नि) ने अपने अनुभव सांझा करते हुए कहा कि हमारे स्कूली जीवन में पुस्तकालयों का विशेष महत्व होता था। लाइब्रेरियन से हमारा एक विशेष स्नेहपूर्ण सम्बन्ध होता था। वे छात्रों को किताबों के बारे में वे उचित मार्गदर्शन देते थे। लाइब्रेरी में एक विशेष अनुशासन भी देखने को मिलता है। लेकिन मेरा मनाना है कि लाइब्रेरी में अनुशासन के साथ ही एक सक्रिय एवं जीवन्त वातावरण होना भी आवश्यक है।

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राज्यपाल ने कहा कि लाइब्रेरी औपचारिक तथा अनौपचारिक शिक्षा मे महत्वपूर्ण योगदान है। विशेषकर अनौपचारिक शिक्षा में विद्यार्थी शिक्षकों की अधिक सहायता नही ले पाते है, ऐसे में पुस्तकालय उनके सबसे बड़े सहायक व मार्गदर्शक हो सकते हैं। ऐसे में सार्वजनिक पुस्तकालयो का विशेष दायित्व है। वे समाज के सभी लोगों की सेवा करते हैं। हम जानते है कि आज देश और दुनिया की तरक्की के लिए शोध कितने महत्वपूर्ण हैं। शोध के लिये सूचनाएं, ज्ञान, रिकॉर्ड अत्यन्त आवश्यक है। ऐसे में शोधकर्ताओं के लिये तो पुस्तकालय किसी वरदान से कम नही है। छात्रों के बौद्धिक विकास में भी पुस्तकालयों की महत्वपूर्ण भूमिका है।

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राज्यपाल ने कहा कि समय के साथ अपने पुस्तकालयों को आधुनिक तकनीकी, डिजिटलाइजेशन, आईटी, बिगेस्ट डाटा एनालिटिक्स, मशीन लर्निंग, डीप लर्निंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जोड़ना होगा। नई पीढ़ी को ऑनलाइन पढ़ाई के साथ पुस्तकालयो के अधिकाधिक प्रयोग के लिये प्रोत्साहित करना होगा। भारत को पुनः विश्व गुरू के रूप में स्थापित करने में प्राचीन भारतीय ज्ञान-विज्ञान की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। लाइब्रेरी तथा लाइब्रेरियन इंफॉर्मेशन वॉरियर्स है। वे हमारे मददगार और मार्गदर्शक हैं। यह अच्छी बात है कि आजकल पुस्तकालय डिजिटल होकर हमारे मोबाइल में आ चुकी है। युवा पीढ़ी की पहुंच सूचना क्रान्ति के कारण ज्ञान के विशाल भण्डार पर सरलता से हो गई है। हमारे पुस्तकालय आर्थिक रूप से कमजोर व प्रतिभाशाली छा़त्रों के लिये अत्यन्त सहायक सिद्ध हो रहे हैं। वे अपना अध्ययन व प्रतिष्ठित परीक्षाओं की तैयारी पुस्तकालयों में कर सकते है।

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इस अवसर पर अर्जुन राम मेघवाल केन्द्रीय मंत्री, प्रो. योगेश सिंह वीसी दिल्ली विश्वविद्यालय, प्रो.वी.एस. चौहान चेयरमैन एनएएसी प्रो0 पी सी जोशी उपकुलपति दिल्ली विश्वविद्याल, प्रो. आई. एम. कपाही, प्रो. सुमन कुन्दु, निदेशक दक्षिणी परिसर प्रो. बलराम पाणी, अधिष्ठाता महाविद्यालय डॉ विकास गुप्ता, रजिस्ट्रार श्री अविनाश, महासचिव राष्ट्रीय सिख संगत आदरणीय स्वामी रामेश्वरानन्द, प्रमुख निर्मल आश्रम संतोष तनेजा, प्रसिद्व शिक्षाविद सरदार राजा इकबाल सिंह, मेयर उत्तर दिल्ली, वीसी प्रोफेसर, प्रिसिपल तथा विद्यार्थी उपस्थित थे।

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