मंदिर में प्रवेश करने से पहले जूते-चप्पल बाहर उतारने की परंपरा क्यों निभाई जाती है?

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समाचार सच, अध्यात्म डेस्क। हिंदू धर्म में मंदिर परिसर में प्रवेश करने से पहले जूते-चप्पल बाहर उतारने की परंपरा अत्यंत प्राचीन काल से चली आ रही है। मान्यता है कि मंदिर को अत्यंत पवित्र और दिव्य स्थान माना जाता है, इसी वजह से वहां जूते पहनकर जाना अपवित्रता और अनादर का प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि आज भी हर मंदिर के बाहर जूते-चप्पल उतारने की एक निश्चित व्यवस्था देखने को मिलती है।

इस परंपरा के पीछे की धार्मिक मान्यता
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, मंदिर की भूमि को देवी-देवताओं का साक्षात निवास स्थान माना जाता है, इसी वजह से इसे अत्यंत शुद्ध और पवित्र बनाए रखना आवश्यक बताया गया है। मान्यता है कि जूते-चप्पल बाहरी दुनिया की गंदगी और अशुद्धता को अपने साथ लेकर आते हैं, इसी वजह से इन्हें मंदिर परिसर में लाना उचित नहीं माना जाता। कथाओं में यह भी उल्लेख मिलता है कि नंगे पांव मंदिर में प्रवेश करना विनम्रता और समर्पण का प्रतीक माना जाता है, जिससे भक्त स्वयं को भगवान के समक्ष पूरी तरह समर्पित महसूस करता है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी है इसका महत्व
धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ इस परंपरा को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी समझाया जाता है। कहा जाता है कि नंगे पांव मंदिर परिसर में चलने से पैरों के तलवों में मौजूद विशेष बिंदुओं पर दबाव पड़ता है, जिसे रिफ्लेक्सोलॉजी के सिद्धांत से जोड़कर देखा जाता है। मान्यता है कि इससे शरीर में रक्त संचार बेहतर होता है और मानसिक शांति भी मिलती है। इसके अलावा जूते-चप्पल के जरिए बाहरी गंदगी और कीटाणुओं को मंदिर परिसर में आने से रोकने का यह एक व्यावहारिक तरीका भी माना जाता है।

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जूते उतारने से जुड़े अन्य नियम
धार्मिक परंपराओं के अनुसार, मंदिर में जूते-चप्पल उतारने के साथ-साथ चमड़े से बनी वस्तुओं, जैसे बेल्ट या पर्स को भी मंदिर परिसर के भीतर ले जाने से बचने की सलाह दी जाती है, क्योंकि चमड़े को अशुद्ध पदार्थ माना जाता है। इसके अलावा यह भी कहा जाता है कि जूते-चप्पल को हमेशा व्यवस्थित तरीके से रखना चाहिए, ताकि मंदिर परिसर के बाहर भी स्वच्छता और अनुशासन बना रहे।

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विदेशों में भी प्रचलित है यह परंपरा
गौर करने वाली बात यह है कि सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई अन्य देशों में भी धार्मिक स्थलों में प्रवेश से पहले जूते उतारने की परंपरा प्रचलित है। यह दर्शाता है कि पवित्र स्थानों के प्रति सम्मान प्रकट करने का यह तरीका सार्वभौमिक रूप से मान्य है, भले ही धर्म और संस्कृति अलग-अलग क्यों न हों।

आज भी हर मंदिर में निभाई जाती है यह परंपरा
समय के साथ भले ही मंदिरों की संरचना और व्यवस्थाओं में कई बदलाव आए हों, लेकिन जूते-चप्पल बाहर उतारकर मंदिर में प्रवेश करने की यह परंपरा आज भी उतनी ही श्रद्धा के साथ निभाई जाती है। आज भी देशभर के मंदिरों में भक्त इस नियम का पूरी सावधानी और सम्मान के साथ पालन करते नजर आते हैं।

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