1965 और 1971 के युद्धों में भी निभाई अहम भूमिका, 16 साल तक भारतीय सेना में दी सेवाएं; 89 वर्ष की उम्र में ली अंतिम सांस
समाचार सच, हल्द्वानी। भारतीय सेना की गौरवशाली परंपरा और कुमाऊं रेजिमेंट के शौर्य की एक प्रेरणादायी गाथा का अध्याय अब मौन हो गया। 6 कुमाऊं के जांबाज पूर्व सैनिक एवं ‘जंगी सिक्स’ के वीर योद्धा हवलदार करन सिंह का 89 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उनके निधन की खबर से कुमाऊं रेजिमेंट, 6 कुमाऊं के पूर्व सैनिकों और सैन्य परिवारों में शोक की लहर है।
हवलदार करन सिंह ने अपने जीवन के महत्वपूर्ण वर्ष देश की सीमाओं की रक्षा में समर्पित किए। उन्होंने 1962 के भारत-चीन युद्ध, 1965 और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्धों में भारतीय सेना के वीर सैनिक के रूप में अपनी जिम्मेदारी निभाई।
1956 में शुरू हुआ सैन्य सफर
हवलदार करन सिंह का जन्म 3 फरवरी 1937 को पिथौरागढ़ जिले के बाकू गांव में हुआ था। देश सेवा के जज्बे के साथ उन्होंने 28 सितंबर 1956 को कुमाऊं रेजिमेंट में भर्ती होकर सैन्य जीवन की शुरुआत की। प्रशिक्षण पूरा करने के बाद उनकी तैनाती 6 कुमाऊं में हुई।
अनुशासन, मेहनत, साहस और कर्तव्यनिष्ठा के चलते उन्होंने सेना में अपनी अलग पहचान बनाई। उनके सैन्य जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय वर्ष 1962 में आया, जब भारत-चीन युद्ध के दौरान उन्होंने ऐतिहासिक बैटल ऑफ वालोंग में हिस्सा लिया।
बैटल ऑफ वालोंग के जांबाजों में शामिल थे करन सिंह
वर्ष 1962 का वालोंग युद्ध भारतीय सैन्य इतिहास के सबसे कठिन अध्यायों में शामिल है। बेहद विषम भौगोलिक परिस्थितियों और दुश्मन की भारी सैन्य ताकत के सामने 6 कुमाऊं के जवानों ने असाधारण साहस और शौर्य का प्रदर्शन किया।
दुश्मन की भारी बढ़त के बावजूद भारतीय जवानों ने मोर्चा नहीं छोड़ा और अंतिम क्षण तक डटे रहे। इसी अदम्य शौर्य और बलिदान की वजह से 6 कुमाऊं को सम्मानपूर्वक ‘जंगी सिक्स’ के नाम से जाना जाने लगा।
हवलदार करन सिंह इस ऐतिहासिक युद्ध के प्रत्यक्ष सहभागी और साक्षी रहे। उनका सैन्य जीवन कुमाऊं रेजिमेंट के उसी गौरवशाली अध्याय से जुड़ा रहा, जिसे भारतीय सैन्य इतिहास में आज भी अदम्य साहस के लिए याद किया जाता है।
1965 और 1971 के युद्धों में भी निभाई जिम्मेदारी
वालोंग के बाद भी देश सेवा का उनका सफर जारी रहा। वर्ष 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद 1971 के युद्ध में भी उन्होंने भारतीय सेना के सैनिक के रूप में अपनी जिम्मेदारी निभाई। इसी युद्ध के बाद दुनिया के नक्शे पर बांग्लादेश एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में अस्तित्व में आया।
लगभग 16 वर्षों तक भारतीय सेना में सेवा देने के बाद वर्ष 1972 में हवलदार के पद से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली और इसके बाद हल्द्वानी में बस गए।
दोनों बेटों ने भी चुना सेना का रास्ता
हवलदार करन सिंह की राष्ट्रसेवा की परंपरा उनके परिवार में भी आगे बढ़ी। उनके दोनों पुत्र ललित सिंह और हरीश सिंह ने भी भारतीय सेना में सेवाएं दीं और सेवानिवृत्त हुए। इस तरह परिवार की कई पीढ़ियों ने देश सेवा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को आगे बढ़ाया।
नोएडा में चल रहा था उपचार
पिछले कुछ समय से हवलदार करन सिंह अस्वस्थ चल रहे थे और उनका नोएडा में उपचार चल रहा था। उपचार के दौरान उनका निधन हो गया। उनके निधन से पूर्व सैनिक समाज ने एक ऐसे योद्धा को खो दिया, जिसने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा राष्ट्र की सुरक्षा और भारतीय सेना की सेवा में समर्पित किया।
चित्रशिला घाट पर हुआ अंतिम संस्कार
हवलदार करन सिंह का अंतिम संस्कार 9 अगस्त 2026 को सुबह 9 बजे चित्रशिला घाट, हल्द्वानी में किया गया। इस दौरान कुमाऊं रेजिमेंट एवं 6 कुमाऊं के पूर्व सैनिकों के साथ बड़ी संख्या में पूर्व सैनिक, सैन्य परिवारों के सदस्य और गणमान्य लोग उपस्थित होकर वीर योद्धा को अंतिम विदाई दी।
पूर्व सैनिकों ने हवलदार करन सिंह के निधन पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए कहा कि देश की रक्षा में जीवन समर्पित करने वाले सैनिक अपने जाने के बाद भी अपनी वीरता और त्याग के माध्यम से सदैव जीवित रहते हैं। उनका साहस और कर्तव्यनिष्ठा आने वाली पीढ़ियों को राष्ट्रसेवा की प्रेरणा देती रहेगी।
‘जंगी सिक्स’ के इस वीर योद्धा की गौरवगाथा कुमाऊं रेजिमेंट और पूर्व सैनिक समाज की स्मृतियों में सदैव जीवित रहेगी।
ॐ शांति।

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