मुख्यमंत्री दिल्ली तलब, उत्तराखण्ड का सियासी पारा बढ़ा

खबर शेयर करें

राज्य में राजनैतिक अस्थिरता पर चर्चायें जारी

समाचार सच, हल्द्वानी। दिल्ली चुनावां में परिणाम आने के बाद केन्द्रीय नेतृत्व ने भाजपा शासित प्रदेश उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत को दिल्ली में तलब किया है। अब इसके पीछे मुख्यमंत्री से ताजा अपडेट लेना हो या कोई और कारण। यह तो भविष्य ही बतायेगा, लेकिन इससे राज्य का सियासी पारा बढ़ गया है।

गौरतलब है कि दिल्ली चुनाव के परिणामों के बाद केन्द्रीय नेतृत्व उन राज्यों का फीटबैंक ले रहा है, जहां राजय में भाजपा सरकार है। इसके पीछे यह कारण बताया जा रहा है कि भविष्य में चुनावों के दौरान पार्टी का प्रदर्शन में सुधार हो। चूंकि राज्य में भाजपा को दो तिहाई बहुमत प्राप्त है। इसलिए लोगों की अपेक्षाएं भी अधिक है। पार्टी को सत्ता में आये तीन वर्ष पूरे होने का हैं। हालांकि सरकार पर अभी तक आरोप प्रत्यारोप नहीं लगे हैं। लेकिन राज्य में जिन मुद्दों पर सरकार बनी थे वे धरातलीय स्तर पर पूर्ण रूप से नहीं उतर पायें है। इधर दिल्ली चुनाव में जनता ने जिस प्रकार विकास के नाम पर वोट दिये है, उससे भी सरकार के समक्ष चुनौती बढ़ गयी है। इधर देहरादून में सियासी तपिश बढ़ गयी है और सियासी गलियारों में नेतृत्व परिवर्तन का मामला छाया हुआ है। हलांकि इस बात की पुष्टि नहीं हुई है। लेकिन राज्य के शीर्ष नेताओं में उठा-पटक के दौरा से इस बात की संभावनायें जताई जा रही है कि कई तो कुछ ना कुछ खिचड़ी पक रही हैं।

यह भी पढ़ें -   नैनीताल में 48 घंटे का ऑरेंज अलर्ट: DM का बड़ा आदेश, BDO से लेकर BLO तक सभी फील्ड कर्मी हाई अलर्ट पर, जनता के लिए जरूरी एडवाइजरी जारी

अभी तक राज्य में नारायण दत्त तिवारी ही पांच वर्ष तक का कार्यकाल ही पूरा कर पाये हैं, इसके अलावा नित्यानंद स्वामी, भगत सिंह कोश्यारी, भुवन चन्द्र खण्डूरी, रमेश पोखरियाल, विजय बहुगुणा व हरीश रावत पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाये।

यह भी पढ़ें -   BLO ने दिया था फॉर्म? आज ही जमा करें, वरना खतरे में पड़ सकता है आपका वोट! कुमाऊं आयुक्त दीपक रावत की बड़ी अपील

उत्तराखण्ड में समस्याओं का अंबार
1-पलायन
2-बेरोजगारी
3-बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था
4-शिक्षा
5-बदहाल सड़कें

छोटे राज्यों में होती हैं, सियासी अस्थिरता
इतिहाास गवाह रहा है कि छोटे राज्यों में अक्सर सियासी अस्थिरताएंे अधिक होती है। मसला झारखण्ड इसका ज्वलन्त उदाहरण है। इसके अलावा गोवा, पूर्वी राज्यों में भी अक्सर सियासी अस्थिरता के मामले देखने में आते हैं। हालांकि कुछ राज्य इसके अपवाद हो सकते है।

जनहित के पैरोकार गायब
राज्य बने बीस वर्ष होने को हैं। लेकिन राज्य में अभी तक जनहितों के पैरोकार गायब से हो गये हैं। आज नेताओं में आम आदमी के मुद्दे गायब हैं। अपनी कुर्सी की खातिर नेता लोग दल बदल करने में भी देर नहीं करते। आलम यह है कि आज कोई नेता किसी अन्य दल में है तो कल को किसी अन्य दल की शोभा बढ़ा रहे होते हैं। कुल मिलाकर जनहितों के पैरोकार गायब होते जा रहे है।

Ad AdAd Ad Ad Ad AdAd Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad

सबसे पहले ख़बरें पाने के लिए -

👉 हमारे व्हाट्सएप ग्रुप से जुड़ें

👉 फेसबुक पर जुड़ने हेतु पेज़ लाइक करें

👉 यूट्यूब चैनल सबस्क्राइब करें

हमसे संपर्क करने/विज्ञापन देने हेतु संपर्क करें - +91 70170 85440