समाचार सच, देहरादून। प्रदेश में लोकपर्व इगास बग्वाल धूमधाम से मनाया जा रहा है। जिसमें मुख्यमंत्री आवास पर आज शाम इगास बग्वाल के मौके पर एक कार्यक्रम का आयोजन हुआ। इस मौके पर सीएम धामी ने प्रदेश वासियों को इगास बग्वाल की बधाई देते हुए शुभकामनाएं दी।
सीएम आवास पर आयोजित इगास के मुख्य कार्यक्रम में सीएम पुष्कर सिंह धामी और कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी भी गढ़वाली गाने पर थिरकते हुए नजर आए। इसके बाद पारंपरिक तरीक भैलो जलाई गई। भैलो जलाने के साथ इगास का कार्यक्रम का आगाज हुआ। वहीं, इस कार्यक्रम में पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक, कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी, सुबोध उनियाल, रेखा आर्य, चंदन राम दास समेत कई दिग्गजों ने शिरकत की।
क्या है इगास पर्वः उत्तराखंड में बग्वाल या इगास मनाने की परंपरा है. दीपावली को यहां बग्वाल कहा जाता है, जबकि बग्वाल के 11 दिन बाद एक और दीपावली मनाई जाती है, जिसे इगास कहते हैं. पहाड़ की लोक संस्कृति से जुड़े इगास पर्व के दिन घरों की साफ-सफाई के बाद मीठे पकवान बनाए जाते हैं और देवी-देवताओं की पूजा की जाती है. साथ ही गाय व बैलों की पूजा की जाती है. शाम के वक्त गांव के किसी खाली खेत या खलिहान में भैलो खेला जाता है. भैलो एक प्रकार की मशाल होती है, जिसे नृत्य के दौरान घुमाया जाता है. इगास पर पटाखों का प्रयोग नहीं किया जाता है.
एक मान्यता ये भी है कि जब मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम 14 वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटे तो लोगों ने घी के दीये जलाकर उनका स्वागत किया था, लेकिन गढ़वाल क्षेत्र में भगवान राम के लौटने की सूचना दीपावली के ग्यारह दिन बाद कार्तिक शुक्ल एकादशी को मिली थी, इसलिए ग्रामीणों ने खुशी जाहिर करते हुए एकादशी को दीपावली का उत्सव मनाया था.
दूसरी मान्यता है कि दिवाली के वक्त गढ़वाल के वीर माधो सिंह भंडारी के नेतृत्व में गढ़वाल की सेना ने दापाघाट और तिब्बत का युद्ध जीतकर विजय प्राप्त की थी और दिवाली के ठीक 11वें दिन गढ़वाल सेना अपने घर पहुंची थी. युद्ध जीतने और सैनिकों के घर पहुंचने की खुशी में उस समय दिवाली मनाई गई थी.एक और कथा भी हैरू एक और ऐसी ही कथा है कि चंबा का रहने वाला एक व्यक्ति भैलो बनाने के लिए लकड़ी लेने जंगल गया था और ग्यारह दिन तक वापस नहीं आया. उसके दुख में वहां के लोगों ने दीपावली नहीं मनाई. जब वो व्यक्ति वापस लौटा तभी ये पर्व मनाया गया और लोक खेल भैलो खेला. तब से इगास बग्वाल के दिन दिवाली मनाने और भैलो खेलने की परंपरा शुरू हुई।



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