हाईकोर्ट के निर्देश के बाद डॉ. आशुतोष पंत के सुझावों पर हुई चर्चा, सिंगल यूज प्लास्टिक के निर्माण से लेकर इस्तेमाल तक पर रोक लगाने की मांग
समाचार सच, देहरादून। रिपोर्ट- अजय सिंह चौहान
उत्तराखंड में पॉलीथीन और सिंगल यूज प्लास्टिक के बढ़ते इस्तेमाल तथा उससे पैदा हो रहे कचरे को लेकर शासन स्तर पर कवायद तेज हो गई है। नैनीताल हाईकोर्ट में दायर जनहित याचिका WPPIL संख्या 82/2026 के मामले में कोर्ट के निर्देश के बाद मुख्य सचिव ने 18 अगस्त को सचिवालय में उच्चस्तरीय बैठक बुलाई। बैठक में उत्तराखंड शासन के 14 विभागों के सचिवों को आमंत्रित किया गया।
यह बैठक पर्यावरणविद् एवं पूर्व जिला आयुर्वेद अधिकारी डॉ. आशुतोष पंत की ओर से मुख्य सचिव को दिए गए सुझावों के आधार पर बुलाई गई। डॉ. पंत ने सिंगल यूज प्लास्टिक, पॉलीथीन, प्लास्टिक बोतलों और नॉन-डिग्रेडेबल पैकेजिंग के निर्माण एवं इस्तेमाल पर प्रभावी रोक लगाने की मांग की है। उनके 26 जुलाई 2026 के पत्र में प्लास्टिक कचरा नियंत्रण को लेकर कई ठोस सुझाव दिए गए थे।
हाईकोर्ट के निर्देश के बाद शुरू हुई प्रक्रिया
डॉ. आशुतोष पंत ने बताया कि उनकी जनहित याचिका पर 24 जुलाई 2026 को नैनीताल हाईकोर्ट में सुनवाई हुई थी। उनके अधिवक्ता पूरन सिंह रावत ने पक्ष रखा। सुनवाई के दौरान उन्होंने स्वयं भी न्यायालय के समक्ष विषय की गंभीरता को रखते हुए तत्काल कार्रवाई की मांग की थी।
उनके अनुसार, हाईकोर्ट की पीठ ने उन्हें एक सप्ताह के भीतर उत्तराखंड के मुख्य सचिव के समक्ष पॉलीथीन प्रदूषण नियंत्रण से संबंधित अपने सुझाव रखने के निर्देश दिए थे। साथ ही मुख्य सचिव को इन सुझावों पर समिति गठित कर कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए थे। इसके अनुपालन में डॉ. पंत ने 26 जुलाई को मुख्य सचिव को विस्तृत सुझाव भेजे।
इसके बाद पर्यावरण संरक्षण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग की ओर से 17 अगस्त को जारी पत्र में 18 अगस्त को मुख्य सचिव की अध्यक्षता में सचिवालय स्थित मुख्य सचिव सभागार में बैठक आयोजित किए जाने की सूचना दी गई। बैठक में संबंधित विभागों के अधिकारियों के साथ डॉ. पंत द्वारा दिए गए सुझावों पर विचार किया गया। पत्र के अनुसार, निदेशक SECCCD और सदस्य सचिव STF की ओर से भी प्रस्तावित बैठक में प्रस्तुतीकरण किया जाना था।
‘सिर्फ इस्तेमाल नहीं, प्लास्टिक का निर्माण भी रोकना होगा’
डॉ. पंत का कहना है कि यदि सरकार वास्तव में प्लास्टिक कचरे की समस्या पर नियंत्रण चाहती है तो केवल पॉलीथीन के इस्तेमाल पर कार्रवाई पर्याप्त नहीं होगी। इसके लिए सिंगल यूज प्लास्टिक के निर्माण को भी रोकना जरूरी है।
उन्होंने अपने सुझावों में कहा है कि यदि कोई कारखाना सिंगल यूज प्लास्टिक का निर्माण करता हुआ पाया जाता है तो उसे सील करने के साथ भारी जुर्माना लगाया जाए। दोबारा प्रतिबंधित गतिविधि पाए जाने पर फैक्ट्री संचालक के साथ संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारियों की जिम्मेदारी भी तय की जाए।
डॉ. पंत ने यह भी सुझाव दिया है कि मौजूदा प्लास्टिक उद्योगों में तकनीकी बदलाव कर उन्हें प्लास्टिक फर्नीचर जैसी अन्य वस्तुओं के निर्माण की दिशा में मोड़ा जा सकता है, ताकि प्रतिबंध का रोजगार पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।
चारधाम और पर्यटन क्षेत्रों में सिंगल यूज प्लास्टिक पर रोक की मांग
पंत ने पर्वतीय क्षेत्रों, चारधाम यात्रा मार्गों और पर्यटन स्थलों पर सिंगल यूज प्लास्टिक, डिस्पोजेबल ग्लास, कटोरी और चम्मच आदि पर पूरी तरह रोक लगाने का सुझाव दिया है। प्रसाद को कागज के लिफाफे या कपड़े की थैलियों में दिए जाने की बात भी उन्होंने कही है।
बुग्यालों और ट्रैकिंग रूटों को प्लास्टिक मुक्त रखने के लिए पर्यटकों और ट्रैकर्स की संख्या सीमित करने तथा उनसे यह शपथपत्र लेने का सुझाव दिया गया है कि वे पानी की बोतल, स्नैक्स के खाली पैकेट और अन्य प्लास्टिक कचरा वापस लेकर आएंगे। रास्ते में कचरा छोड़ने वालों पर भारी जुर्माना लगाने की मांग भी की गई है।
‘हिमालय को प्लास्टिक के लिए जीरो जोन बनाया जाए’
डॉ. पंत ने हिमालयी क्षेत्र को प्लास्टिक के लिए ‘जीरो जोन’ बनाने की जरूरत बताई है। उन्होंने कहा है कि हिमालय केवल एक पर्वत श्रृंखला नहीं, बल्कि उत्तर भारत के बड़े हिस्से के लिए जीवन का आधार है। ग्लेशियरों के संरक्षण को प्राथमिकता देने की जरूरत है।
उन्होंने सिक्किम और अंडमान में प्लास्टिक नियंत्रण के मॉडल का उदाहरण देते हुए उत्तराखंड में भी इसी तरह की व्यवस्था लागू करने का सुझाव दिया है। उनके अनुसार, उत्तराखंड में प्रभावी प्लास्टिक प्रतिबंध लागू कर इसे प्लास्टिक मुक्त राज्य की दिशा में ले जाया जा सकता है।
भंडारे और सार्वजनिक आयोजनों में प्लास्टिक के इस्तेमाल पर भी रोक
डॉ. पंत ने शहरों, कस्बों और गांवों में सड़क किनारे होने वाले भंडारों तथा शरबत वितरण जैसे आयोजनों से पैदा होने वाले प्लास्टिक कचरे पर भी चिंता जताई है। उनका कहना है कि धार्मिक आस्था का सम्मान जरूरी है, लेकिन आयोजनों से निकलने वाला कचरा समाज के लिए परेशानी का कारण नहीं बनना चाहिए।
उन्होंने ऐसे आयोजनों के लिए स्थानीय निकायों से अनुमति अनिवार्य करने और आयोजकों को कचरा प्रबंधन की जिम्मेदारी देने का सुझाव दिया है। 100 से अधिक लोगों के शामिल होने वाले आयोजनों में आयोजकों द्वारा स्वयं कचरा प्रबंधन की व्यवस्था करने अथवा सफाई के लिए शुल्क देने की व्यवस्था का सुझाव भी दिया गया है।
‘सिर्फ कानून नहीं, जनभागीदारी भी जरूरी’
डॉ. पंत के मुताबिक पॉलीथीन और प्लास्टिक कचरे की समस्या का समाधान केवल सरकारी नियमों से संभव नहीं है। इसके लिए लोगों की आदतों में बदलाव और व्यापक जनजागरूकता जरूरी है।
उन्होंने सार्वजनिक स्थानों पर कूड़ा फैलाने वालों पर सख्त जुर्माने के साथ दोबारा गलती करने वालों के लिए अतिरिक्त दंड का सुझाव दिया है। साथ ही कूड़ा संग्रहण व्यवस्था को मजबूत करने और लोगों को गीले एवं सूखे कचरे को अलग-अलग देने के लिए जागरूक करने की आवश्यकता बताई है।
उनका कहना है कि आज गांवों, कस्बों और शहरों में जगह-जगह कूड़े के ढेर दिखाई देते हैं। बारिश के दौरान यही कचरा नालियों और ड्रेनेज सिस्टम को जाम करने में बड़ी भूमिका निभाता है, जिससे जलभराव की समस्या बढ़ती है।
‘मुख्य सचिव की बैठक से जगी उम्मीद’
डॉ. आशुतोष पंत ने कहा कि मुख्य सचिव की ओर से बैठक बुलाया जाना सकारात्मक पहल है। इससे उम्मीद जगी है कि उत्तराखंड में पॉलीथीन और सिंगल यूज प्लास्टिक के नियंत्रण को लेकर अब शासन स्तर पर प्रभावी कदम उठाए जाएंगे।
उन्होंने कहा कि उनकी प्राथमिक मांग सिंगल यूज प्लास्टिक के निर्माण और इस्तेमाल पर पूर्ण प्रतिबंध की है। उनका मानना है कि जब तक प्लास्टिक का उत्पादन और बाजार में उसकी आपूर्ति जारी रहेगी, तब तक प्लास्टिक कचरे की समस्या का स्थायी समाधान मुश्किल होगा।
डॉ. पंत ने यह भी आग्रह किया है कि हाईकोर्ट के निर्देश के अनुरूप यदि शासन कोई समिति गठित करता है तो उन्हें भी समिति की बैठक में अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाए।
डॉ. आशुतोष पंत ने कहा कि उत्तराखंड जैसे हिमालयी राज्य में प्लास्टिक प्रदूषण पर तत्काल और प्रभावी कार्रवाई की जरूरत है। अब देखना होगा कि मुख्य सचिव की अध्यक्षता में हुई बैठक के बाद शासन इस दिशा में कौन से ठोस फैसले लेता है।

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