मुहर पति के पास रहेगी तो कैसे बड़ेगी महिला आगे
समाचार सच, हल्द्वानी (धीरज भट्ट)। पिछले बीस सालों में महिला सशक्तिकरण व उनके प्रतिननिधित्व पर तमाम दावे भले ही किये गये हों लेकिन राज्य में इक्का-दुक्का मामलों को छोड़कर महिलाएं सियासत में अपना स्थान बनाने में कामयाब नहीं हुई हैं। हालाकि कुछ महिलाएं इनका अपवाद कही जा सकती हैं।
ज्ञात हो कि राज्य बने बीस साल पूरे हो गये हैं लेकिन राज्य में अभी तक महिलााओं का प्रतिनिधित्व दहाई तक नहीं पहुंचा है और नहीं राज्य में महिलाएं अपनी पहचान बनाने में कामयाब हो पायी हैं। हालाकि कुछ महिलाओं ने इस परिस्थितिवश कहें या अपने बलबूते कहीं जरूर पहचान बनायी है। लेकिन आधी आबादी के मद्देनजर ये ऊंठ के मुंह में जीरे के समान है।
सियासी गलियारों में देखा जाये तो पिछले दो दशकों के दौरान राज्य में डा. इन्दिरा हृदयेश, रेखा आर्या, अमृता रावत, सरिता आर्या समेत कुछ गिनी-चुनी महिलाओं ने राज्य में महिला सशक्तीकरण के नारे को सार्थक बनाये रखा। हालाकि डा. इन्दिरा अविभाजित उत्तर प्रदेश के दौरान से ही सियासत में अपनी मौजूदगी बनाये हुए हैं।
इधर देखा जाये तो महिलाओं का नेतृत्व नहीं उभरने के पीछे सियासी दल भी जिम्मेदार हैैं। जब महिलाओं को टिकट नहीं मिलेगा तो इन स्थितियों में उनका प्रतिनिधित्व कैसे बढ़ेगा। हालाकि महिलाओं के 33 प्रतिशत आरक्षण की मांग विधानसभा से संसंद में पेश करने की बात होती है तो सियासी दल इस पर ईमानदारी से कार्य करने को तैयार नहीं हैं।
प्रधानपति और मेम्बर पति हावी
हल्द्वानी। भले ही महिलाओं के सशक्तिकरण के तमाम दावे किये जाते हों लेकिन आज भी महिलाएं पुरूषों की पिछलग्गू बनी हुई हैं। कुछ मामलों को छोड़ दें तो अधिकतर जनप्रतिनिधि महिलाओं के अधिकतर काम काज का जिम्मा उनके पति ही संभाले रहते हैं। यहां तक कि महिलाएं हस्ताक्षर करने तक ही सीमित रहती है। देखने में आया है कि महिला जनप्रतिनिधियों की मुहर उनके पतियों के पास रहती है। इन स्थितियों में महिलाएं आगे कैसे बढ़ेंगी।



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