पुण्य कमाने की होड़ कहीं पर्यावरण पर भारी तो नहीं?

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लेखक : डॉ आशुतोष पन्त (पूर्व जिला आयुर्वेद अधिकारी/पर्यावरणविद)।
मई-जून की भीषण गर्मी में देशभर में जगह-जगह राहगीरों को ठंडा शरबत पिलाने और भंडारे लगाने की परम्परा देखने को मिलती है। यह भारतीय संस्कृति की पुरानी और सराहनीय परम्परा रही है। पुराने समय में जब यातायात के साधन सीमित थे और लोग लंबी दूरी पैदल या बैलगाड़ी से तय करते थे, तब गांवों और बस्तियों के बाहर लगाए जाने वाले प्याऊ यात्रियों के लिए बड़ी राहत साबित होते थे। इस सेवा परम्परा को सनातन समाज के साथ-साथ सिक्ख और जैन समुदाय ने भी श्रद्धा के साथ आगे बढ़ाया।

समय के साथ यह परम्परा और व्यापक हुई है। आज शहरों और कस्बों में अनेक स्थानों पर टैंट लगाकर शरबत, पानी और भोजन वितरित किया जाता है। निस्संदेह इससे मेहनतकश और जरूरतमंद लोगों को राहत मिलती है, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में इसका एक चिंताजनक पक्ष भी सामने आ रहा है।

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अक्सर देखा जाता है कि राह चलते लोगों, वाहन चालकों और यात्रियों को प्लास्टिक या पेपर ग्लास में शरबत थमा दिया जाता है। लोग चलते-चलते इन ग्लासों को सड़क किनारे फेंक देते हैं। इसी प्रकार भंडारों में प्रयोग होने वाले सिंगल यूज़ प्लास्टिक गिलास, कटोरे और चम्मच आयोजन समाप्त होने के बाद सड़कों और नालियों में बिखरे दिखाई देते हैं।

स्थिति यह है कि एक ही दिन में शहर में कई स्थानों पर ऐसे आयोजन होते हैं और दोपहर तक सड़कें कूड़े के ढेर में तब्दील हो जाती हैं। यह कचरा केवल बदसूरती ही नहीं फैलाता, बल्कि मानसून के दौरान नालियां जाम होने और जलभराव जैसी समस्याओं का कारण भी बनता है। कई बार यही प्लास्टिक कचरा शहरी बाढ़ की स्थिति को और गंभीर बना देता है।

सेवा और पुण्य का उद्देश्य निश्चित रूप से सम्माननीय है, लेकिन इसके साथ पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी भी जरूरी है। आयोजकों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कार्यक्रम के बाद सफाई की समुचित व्यवस्था हो। केवल एक-दो डस्टबिन रख देने भर से समस्या का समाधान नहीं होता।

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यदि थोड़ी समझदारी से काम लिया जाए तो इस समस्या को काफी हद तक रोका जा सकता है। उदाहरण के तौर पर, डिस्पोजेबल सामग्री के स्थान पर स्टील या कांच के गिलास और बर्तनों का उपयोग किया जा सकता है। सीमित संख्या में बर्तन रखकर उन्हें धोकर पुनः इस्तेमाल करने की व्यवस्था अपनाई जाए तो प्लास्टिक कचरे को काफी कम किया जा सकता है।

इसके अलावा, यदि सेवा कार्य को स्थायी स्वरूप देना हो तो सार्वजनिक स्थानों पर प्याऊ या वॉटर कूलर स्थापित करना अधिक उपयोगी कदम साबित हो सकता है। इससे जरूरतमंद लोगों को लंबे समय तक स्वच्छ पेयजल उपलब्ध होगा और प्लास्टिक प्रदूषण भी नहीं फैलेगा।

समाज सेवा तभी सार्थक मानी जाएगी, जब वह मानव के साथ-साथ पर्यावरण के हितों का भी ध्यान रखे। पुण्य कमाने की भावना के साथ स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण को जोड़ना आज समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

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