136 वर्ष बाद भी एक सेंटीमीटर रेलवे लाइन का नहीं हो पाया विस्तार

समाचार सच, हल्द्वानी। 24 अप्रैल 1884 का दिन कुमांऊ के प्रवेश द्वार काठगोदाम में पहली बार लौहपथगामिनी (रेलगाड़ी) पहुंची थी। उस दौरान यहां का क्षेत्र में तब घने जंगल हुआ करते थे और यहां पर जंगली जानवरों की दहशत हुआ करती थी। हालांकि तब से एक इंच भी यह लाइन आगे नहीं बढ़ सकी। अंग्रेजों ने इसे अपने व्यापार व्यवसाय को सुचारू करने के लिये यहां पर रेलवे लाइन बिछाना मुनासिब समझा।

गौरतलब है कि अंग्रेजों ने पहाड़ों में अपने व्यवसाय को मजबूती प्रदान करने के लिए दूरस्थ क्षेत्रों में भी रेलवे लाइन की नींव रखनी शुरू की। हालांकि महानगरों व बड़े नगरों में तो ट्रेन की व्यवस्था कर ली थी। यहां पर आगे पहाड़ होने के कारण उनकी कोशिश परवाना नहीं चढ़ पायी। अंग्रेजों ने 1870 में दशक में उन्होंने यहां पर पटरियों की नींव रखने का काम शुरू कर दिया था। हालांकि यहां पर ट्रेन पहुंचने का शुभारम्भ 14 अप्रैल 1884 को हुआ। यहां पहली बार लखनऊ से ट्रेन पहुंची थी।

काठगोदाम रेलवे स्टेशन इंचार्ज ‘‘चयन रॉय’’ का कहना है कि काठगोदाम में आज के दिन ट्रेन पहुंची थी। वर्तमान में 11 ट्रेन संचालित हो रही है। यहां के नैरो गेज रेलवे लाइन को ब्राडगेज में 1996 में तब्दील हुआ था। लॉक डाउन से पूर्व यहां से औसतन 50 हजार (रिर्जवेशन सहित) यात्री आवागमन करते हैं।
पटरी किनारे बसे लोगों को हुआ कौतुहल
हल्द्वानी। इतिहासकार व बुर्जुग लोगों का कहना है कि जब यहां ट्रेन का पहली बार आगमन हुआ तो तब रेलगाड़ी आवाज और धुंए को देखकर पटरी किनारे बसे लोगों को बड़ा आश्चर्य हुआ था। कुछ लोगों ने तो डर के मारे दौड़ भी लगा दी थी।
लकड़ी के गोदाम के कारण बना काठगोदाम
इतिहासकारों का कहना है कि काठगोदाम को पहले चौहान पाटा के नाम से जाना जाता था। 19वीं सदी के आरम्भ में एक गांव हुआ करता था। उस दौरान लकड़ी के कारोबारी के नाम से जाने वाले दान सिंह बिष्ट ऊर्फ दानसिंह मालदार ने यहां पर कई लकड़ी के गोदाम बनाये थे। लकड़ी को काठ के नाम से भी जाना जाता है। इसलिए लकड़ी (काठ) के गोदाम के कारण बाद में यहां का नाम काठगोदाम पड़ गया। दानसिंह मूलतः पिथौरागढ़ के निवासी थे और बीर भट्टी सहित अनेक स्थानों पर उनकी संपत्ति थी।
यातायात व्यवस्था ना होने के कारण बहा के लाते थे लकड़ी
उस दौरान पहाड़ों में यातायात के सुविधा कम होने के कारण वहां से लकड़ियों को लकड़ी के ठेकेदार नदियों में बहाकर लाते थे। यहां पर लकड़ियां गौला में बहाकर लायी जाती थी। यहां पर उन लकड़ियों को गोदामों में रख दिया जाता है। यहां से व्यापारियों को लकड़ियां भेजने के लिये ट्रेन बेहतर साधन के रूप में उभरी।

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