आइए जानते हैं कि पायल पहनने का सही तरीका व नियम क्या है?

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समाचार सच, अध्यात्म डेस्क। महिलाओं के शृंगार में पायल का पहनना भी शामिल है। हिंदू धार्मिक मान्यताओं में शादीशुदा महिला का पायल पहनना बेहद शुभ होता है। पायल केवल आभूषण नहीं होती है बल्कि सौभाग्य और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक भी मानी जाती है। लेकिन ज्योतिष में इसे पहनने के कुछ नियम बताए गए हैं। मान्यता है कि यदि गलत तरीके से पायल पहना जाता है, तो जीवन में कई तरह के संकट झेलने पड़ते हैं। वहीं, सही तरीके और सही समय पर पायल पहनने से न सिर्फ सौभाग्य बढ़ता है, बल्कि मानसिक शांति, वैवाहिक सुख और आर्थिक स्थिरता भी बनी रहती है। चलिए जानते हैं कि पायल पहनने का सही तरीका व नियम क्या है?

चांदी की पायल का महत्व
पायल पहनने की परंपरा बहुत पुरानी है। खासकर चांदी का पायल पहनना बेहद शुभ होता है। चांदी को चंद्रमा की धातु माना गया है, जो मन, भावनाओं और शांति से जुड़ा होता है। स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से भी यह लाभदायी है। इससे शरीर में ठंडक बनी रहती है। चांदी एक ऐसा धातु है जो शरीर की गर्मी को संतुलित करता है। यह पैरों में सूजन, दर्द और थकान जैसी समस्याओं को भी कम करता है। इसके अलावा चांदी शरीर की नकारात्मक ऊर्जा को खींच लेती है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है।
इन गलतियों से बचें

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  • लोहे, पीतल या किसी अन्य मेटल की पायल भूलकर भी नहीं पहननी चाहिए।
  • आपको कभी भी टूटी हुई या खराब पायल नहीं पहननी चाहिए। ऐसी पायल आपके जीवन में दुर्भाग्य ला सकती है।
  • शास्त्रों की मानें तो टूटी हुई पायल नकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित करती है और सौभाग्य में कमी ला सकती है।
  • टूटी हुई पायल तुरंत बदल देनी चाहिए और उसके स्थान पर आपको दूसरी पायल पहन लेनी चाहिए।
  • सोने की पायल भी नहीं पहननी चाहिए। इससे नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है और माता लक्ष्मी का अपमान होता है।
  • हमेशा शुद्ध चांदी की पायल पहनें, जिससे आपका चंद्रमा मजबूत रहे और मन शांत बना रहे।
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एक पैर में ना पहनें
एक पैर में ही पायल पहनना शुभ नहीं माना जाता है। यह शरीर के संतुलन को बिगाड़ देता है। एक पैर में पायल पहनने से जीवन में नकारात्मकता आती है और पायल पहनने के पूर्ण फल नहीं मिलते हैं। ऐसे में दोनों पैर में पायल पहनने की सलाह दी जाती है।

पहनने की विधि

  • पायल पहनने से पहले उसे गंगाजल से शुद्ध करें।
  • फिर “ऊँ सौभाग्य लक्ष्म्यै नमः” मंत्र का 11 बार जप करें।
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