पलायन रोकने की दरकार, कब तक करेंगे इंतजार

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समाचार सच, हल्द्वानी। राज्य में पलायन हो रहा है, यह जगजाहिर है लेकिन इस पर अंकुश लगाने के लिए ठोस कार्ययोजना को मूर्तरूप दिये जाने की आवश्यकता हैं। राज्य बनाने की अवधारणा के पीछे कहीं न कहीं पलायन भी एक कारण था। राज्य बनने से पूर्व व बाद में भी यहां से पलायन को रोकने के लिए ईमानदारी से प्रयास हुए होते तो स्थिति इतनी भयावह नहीं होती। हालांकि रावत सरकार ने पलायन रोकने के लिए पलायन आयोग का गठन किया गया। पलायन रोकने के लिए एक विजन बनना बाकी है। आजकल राज्य में रिवर्स पलायन पर बहस जारी है। इसलिए पलायन को रोकने के लिए कुछ बिन्दुओं पर बहस की आवश्यकता है। इस पर प्रकाश डाल रहे हैं समाचार सच के सहायक संपादक धीरज भट्ट –

क्या है रिवर्स पलायन
रिवर्स पलायन का तात्पर्य वापसी से होता है हालांकि एक बार जो पलायित हो जाता है, उसकी वापसी होना मुश्किल है। पलायन को रोकने में कुछ बिन्दुओं पर फोकस करें तो रिवर्स पलायन की कुछ संभावनाएं बन जाती है। राज्य के सीएम रिवर्स पलायन पर होमवर्क की बात कर रहे हैं, देखों कहां तक इस पर रोक लगायी जा सकती है।

साभार: सोशल मीडिया

भावनात्मक रूप से लोगों को जोड़ना होगा
पहाड़ों से स्थायी पलायन के पीछे लोगों का यहां से भावनात्मक लगाव कम होना भी है। अगर हम अपने पुरखों की माटी से भावनात्मक रूप से जुड़ जायेंगे तो हमारा अपने गांवों के प्रति रूझान बढ़ेगा और हम अपने पूर्वजों की जन्मभूमि से जुड़े पायेंगे।

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सुविधाओं पर फोकस करे सरकार
सरकार पहाड़ों में सुविधाओं का विकास करें तो पलायन पर अंकुश लगाया जा सकता है। मसलन स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क व रोजगार पर सरकार का फोकस हो तो कुछ हद तक पलायन को रोका जा सकता है।

स्थायी राजधानी पहाड़ में हो
उत्तराखण्ड की अवधारणा एक पहाड़ी राज्य की है। राजधानी किसी राज्य का आइना होता है। इसलिए पहाड़ी राज्य की राजधानी पहाड़ में होनी चाहिए। इसलिए उत्तराखण्ड की राजधानी पहाड़ में हैं तो यहां के लोगों को पलायन से रोकने के लिए प्रेरित किया जा सकता है।

प्रवासी भारतीयों को जागरूक करे सरकार
उत्तराखण्ड के अनेक लोग बाहरी देशों में स्थायी रूप से बस चुके हैं। अगर उन लोगों को जागरूक किया जाये तो वे अपनी माटी का कर्ज उतारने के लिए सहर्ष तैयार हो सकते है। इसके लिए सरकार को ठोस पहली करनी आवश्यक है।

यातायात के साधन सुलभ हो
पहाड़ों में ज्यादातर यातायात सड़क मार्ग से ही होता है। पहाड़ी जिले रेल मार्ग से वंचित हैं। हवाई यातायात पहाड़ों में हेलीकाप्टर से ही संभव हो। दुर्गम जिलों में हवाई पट्टी का विकास होने से पर्यटकों को इसका फायदा मिल सकता है। नैनी सैमी का उद्घाटन 30 वर्ष पूर्व होने के बाद भी यहां से नियमित उड़ाने नहीं होती।

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जनप्रतिनिधियों को भी देना होगा सहयोग
पलायन को रोकने के लिए जनप्रतिनिधियों का भी अहम रोल है। आजकल पहाड़ के अधिकतर जनप्रतिनिधि अक्सर मैदानी शहरों, मसलन देहरादून, दिल्ली, हल्द्वानी या राजधानी के आसपास अन्य शहरों में रहते हैं। अगर जनप्रतिनिधि अगर महीने में दो हफ्ते भी अपने मूल गांव में रहें तो इससे अन्य लोगों को भी उनसे शिक्षा मिलेगी।

एयरकंडीशर रूमों की योजनायें नहीं होती फलीभूत
पहाड़ों में पलायन को रोकने के लिए अधिकतर योजनाएं एयरकंडीशर रूमों में बनती है जो फलीभूत नहीं होती है। पहाड़ों से पलायन को रोकने के लिए धरातल पर कार्य योजना बनानी पड़ेगी, जिससे अमलीजामा पहनाकर अपेक्षित सफलता पायी जा सकती है।

साभार: सोशल मीडिया

राज्य में हैं असीम संभावनायें
हल्द्वानी।
उत्तराखण्ड को प्रकृति ने तमाम नेमत दे रखी है। सदानीरा नदियां गंगा यमुना, सदाबाहर जंगल प्रदान किये हैं। वहीं धार्मिक पर्यटन हो या प्राकृतिक पर्यटन यह किसी परिचय का मोहताज नहीं है। इसे जल विद्युत, पर्यटन, मछली पालन, पशुपालन पर्यटन प्रदेश के रूप में विकसित किया जा सकता है। नदियों पर आधारित उद्योग – धन्धों से राजस्व बढ़ाया जा सकता है। वहीं फल, सब्जियां, जड़ी बूटियों के उत्पादन में भी काफी संभावनाएं हैं। खड़िया उत्पादन में भी राज्य का विशिष्ट स्थान है। कुक्कुट पालन कर भी रोजगार सृजन किया जा सकता है।

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