संस्कृत के जयघोष से गूंजा हल्द्वानी, 750 लोगों ने निकाली भव्य शोभायात्रा

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रामलीला मैदान से हीरानगर तक दिखी संस्कृत की झलक, मेयर गजराज सिंह बिष्ट ने हरी झंडी दिखाकर किया शुभारंभ

समाचार सच, हल्द्वानी।
संस्कृत भाषा और भारतीय संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन का संदेश लेकर हल्द्वानी की सड़कों पर निकली विशाल संस्कृत शोभायात्रा ने शहर का माहौल संस्कृतमय कर दिया। उत्तराखंड संस्कृत अकादमी, हरिद्वार की ओर से आयोजित इस भव्य शोभायात्रा का शुभारंभ रामलीला मैदान से हुआ। मेयर गजराज सिंह बिष्ट ने हरी झंडी दिखाकर शोभायात्रा को रवाना किया।

शोभायात्रा में आकर्षक एवं भव्य झांकियां लोगों के आकर्षण का केंद्र रहीं। छात्र-छात्राएं हाथों में ध्वज और संस्कृत में लिखी पट्टिकाएं लेकर चल रहे थे। जगह-जगह संस्कृत के उद्घोष, गीत और श्लोकों का उच्चारण सुनाई देता रहा। रामलीला मैदान से शुरू हुई शोभायात्रा शहर के प्रमुख मार्गों से होते हुए पर्वतीय उत्थान मंच, हीरानगर पहुंची।

शोभायात्रा को देखने के लिए मार्ग के दोनों ओर बड़ी संख्या में लोग जुटे। लोगों ने विभिन्न झांकियों का दर्शन किया और उनका स्वागत किया। मेयर गजराज सिंह बिष्ट भी पूरी शोभायात्रा में पैदल शामिल रहे। उनके साथ पूर्व भाजपा जिलाध्यक्ष प्रदीप बिष्ट, महामंडलेश्वर स्वामी मोनानंद जी महाराज समेत अनेक विद्वान, सामाजिक कार्यकर्ता और गणमान्य लोग भी पैदल चलते रहे।

संस्कृत के महत्व का दिया संदेश
शोभायात्रा के दौरान उत्तराखंड संस्कृत अकादमी के सचिव प्रो. डॉ. विनय विद्यालंकार ने लोगों को संस्कृत भाषा के महत्व और उसकी उपयोगिता के बारे में जानकारी दी। उन्होंने संस्कृत को भारतीय ज्ञान परंपरा और संस्कृति से जोड़ते हुए लोगों से इसे जन-जन तक पहुंचाने का आह्वान किया।
पर्वतीय उत्थान मंच, हीरानगर पहुंचने के बाद शोभायात्रा का समापन विशाल गोष्ठी एवं सम्मान समारोह के रूप में हुआ।

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संस्कृत देवभाषा, जन-जन की भाषा बने : मेयर
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि मेयर गजराज सिंह बिष्ट ने कहा कि संस्कृत देवभाषा है और उत्तराखंड में इसे द्वितीय राजभाषा का दर्जा प्राप्त है। ऐसे में संस्कृत को केवल विद्यालयों और विद्वानों तक सीमित रखने के बजाय इसे जन-जन की भाषा बनाने की दिशा में प्रयास किए जाने चाहिए। उन्होंने कहा कि इसके लिए समाज के प्रत्येक वर्ग को संस्कृत की महत्ता और उपयोगिता समझनी होगी।
महामंडलेश्वर स्वामी मोनानंद महाराज ने कहा कि संस्कृत भाषाओं की जननी है और भारतीय ज्ञान, आध्यात्म तथा संस्कृति की विशाल परंपरा संस्कृत से जुड़ी हुई है।

विशिष्ट अतिथि प्रदीप बिष्ट ने कहा कि संस्कृत के माध्यम से व्यक्ति को जीवन में आध्यात्म और भारतीय संस्कृति का मार्गदर्शन मिलता है।

पूरे प्रदेश में संस्कृत को लेकर हो रहे कार्यक्रम
उत्तराखंड संस्कृत अकादमी के सचिव प्रो. डॉ. विनय विद्यालंकार ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि अकादमी की ओर से पूरे प्रदेश में संस्कृत को जन-जन तक पहुंचाने के उद्देश्य से विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इनमें संस्कृत शोभायात्रा, संस्कृत छात्र प्रतियोगिताएं, संस्कृत सप्ताह और संस्कृत मास जैसे आयोजन शामिल हैं।

उन्होंने बताया कि संस्कृत सप्ताह का शुभारंभ श्रीनगर गढ़वाल से किया गया था, जबकि समापन हल्द्वानी में भव्य संस्कृत शोभायात्रा और गोष्ठी के साथ किया गया।

सहायक निदेशक संस्कृत डॉ. यशोदा प्रसाद सिमल्टी ने शोभायात्रा में संस्कृत से जुड़े विद्यार्थियों, विद्वानों, कथा व्यास, आचार्यों और सामाजिक संगठनों की भागीदारी को सराहनीय बताया।

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सात विद्यालयों के छात्र-छात्राओं ने लिया हिस्सा
कार्यक्रम के मुख्य संयोजक खंड शिक्षा अधिकारी तारा सिंह ने बताया कि शोभायात्रा में सात विद्यालयों के छात्र-छात्राओं और शिक्षकों ने प्रतिभाग किया। सहसंयोजक डॉ. नवीन चंद्र जोशी ने बताया कि संस्कृत सप्तमी के समापन समारोह के अवसर पर यह विशाल शोभायात्रा आयोजित की गई।

उन्होंने बताया कि शोभायात्रा में विद्यार्थियों, सामाजिक संगठनों, विद्वानों और अतिथियों सहित करीब 750 लोगों ने भाग लिया। प्रतिभागियों के लिए भोजन एवं जलपान सहित अन्य व्यवस्थाएं उत्तराखंड संस्कृत अकादमी की ओर से की गईं।
सहसंयोजक डा नवीन चन्द्र जोशी ने बताया कि शोभायात्रा में छात्रों सामाजिक संगठनों विद्वानों अतिथियों सहित 750 लोगों ने शोभायात्रा में भाग लिया।

विद्वानों और विद्यालयों को किया सम्मानित
समापन समारोह में विभिन्न क्षेत्रों में संस्कृत एवं संस्कृति के लिए योगदान देने वाले विद्वानों को सम्मानित किया गया। डॉ. भुवन चंद्र त्रिपाठी, श्रीमती जानकी त्रिपाठी, डॉ. देवेंद्र प्रसाद हरबोला, डॉ. केसी जोशी, डॉ. राजेंद्र भट्ट, डॉ. मनोज पांडेय सहित अनेक विद्वानों को सम्मान पत्र देकर सम्मानित किया गया। इसके साथ ही शोभायात्रा में शामिल सभी विद्यालयों को भी प्रशस्ति पत्र प्रदान किए गए।

कार्यक्रम को सफल बनाने में डॉ. चंद्र बल्लभ बेलवाल, डॉ. नवीन चंद्र बेलवाल, डॉ. एसडी तिवारी, डॉ. जगदीश पांडेय, डॉ. नीरज जोशी, चंद्रशेखर भट्ट, डॉ. डी.डी. गुणवंत, भारत भूषण पांडेय, डॉ. नारायण दत्त थुवाल, डॉ. प्रकाश रुवाली, डॉ. कल्पना जोशी सहित अनेक लोगों ने सहयोग किया।
कार्यक्रम का संचालन शोध अधिकारी डॉ. हरीश चंद्र गुरुरानी और सहसंयोजक डॉ. नवीन चंद्र जोशी ने किया।

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