केदारनाथ आपदा के सात साल…

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समाचार सच, देहरादून। प्रदेश में केदारनाथ आपदा के सात सालों बाद भी अभी सबक लिए जाने बाकी है। प्रदेेश में तमाम कोशिश के बाद भी संचार का बेहतर नेटवर्क स्थापित नहीं हो पाया है। यह तब है जब मौसम में बदलाव के कारण आपदा का खतरा लगातार बढ़ रहा है।  जून 2013 में आई केदारनाथ की आपदा पर पूरे विश्व का ध्यान गया था। इस आपदा के बाद हुए परफार्मेंस ऑडिट में कैग ने भी प्रदेश की आपदा प्रबंधन व्यवस्था को लेकर सवाल उठाए थे। कैग रिपोर्ट के बाद राष्ट्रीय और राज्य के स्तर पर हुई कार्यशालाओं में यह बात भी सामने निकल कर आई थी कि प्रदेेश को सबसे अधिक जरूरत बेहद मजबूत संचार तंत्र की है। ऐसा तंत्र जो आपदा के समय काम कर सके। इसके साथ ही खतरे की पूर्व चेतावनी का तंत्र भी स्थापित करने की बात की गई थी। केदारनाथ की आपदा का एक बड़ा सबक संवेदनशील स्थानों को चिह्नित करना और वहां रहे लोगों को खतरे से दूर करना भी शामिल था। भूकंप के लिहाज से प्रदेश जोन चार और पांच में शामिल है। इसके अलावा प्रदेश भू स्खलन के हिसाब से भी अति संवेदनशील है। करीब 200 अति संवेदनशील जोन इसमें चिह्नित भी किए जा चुके हैं।मौसम में बदलाव के कारण अब मानसून में बहुत अधिक बारिश के मामले भी सामने आ रहे हैं। इससे मैदानी क्षेत्रों में बाढ़ और पर्वतीय क्षेत्रों में भूस्खलन के मामले बढ़ रहे हैं। ग्लेशियरों के सुकड़ने के कारण अब उच्च हिमालयी क्षेत्र में नई झीलों का निर्माण भी हो रहा है और इस वजह से अचानक आने वाली बाढ़ का खतरा भी बढ़ रहा है। स्टेट ऑफ इनवायरमेंट रिपोर्ट के मुताबिक उत्तराखंड दो बार नौ स्केल तक के भूकंप का सामना कर चुका है। 1803 में आए इस भूकंप से बद्रीनाथ क्षेत्र प्रभावित हुआ था। 1809 में गढ़वाल क्षेत्र में इतनी ही तीव्रता का भूकंप आया था। आईएमडी की एक रिपोर्ट के मुताबिक 1803 के बाद से उत्तराखंड अब तक करीब 65 भूकंपों का सामना कर चुका है। इसमें से 11 ऐसे रहे हैं जो अधिक नुकसान वाले साबित हुए। इसमें उत्तरकाशी और चमोली में 1990 के बाद आए भूकंप भी शामिल हैं। आपदाओं का सामना करने के लिए ऐसा नहीं है कि कुछ किया नहीं गया। प्रदेश में आपदा प्रबंधन प्राधिकरण का गठन किया जा चुका है और राज्य आपदा मोचन बल भी गठित है। प्रदेश में दो स्थानों पर डाप्लर रडार लगाए जा रहे हैं और मौसम की जानकारी के लिए मौसम केंद्र स्थापित किए गए हैं। प्रदेश में भूकंप की पूर्व चेतावनी देने वाला तंत्र भी स्थापित कर दिया गया है। प्रदेश पर अब अचानक आने वाली बाढ़ का खतरा अधिक मंडरा रहा है। प्रदेश में 1200 से अधिक ग्लेशियर झीलें चिह्नित की जा चुकी हैं। इनमें से अधिकतर नई झीलें हैं। इनकी पूर्व चेतावनी का तंत्र अभी तक विकसित नहीं किया जा सका है। इसी तरह नदियों के बाढ़ क्षेत्र को खाली कराने का काम भी अभी तक सरकार नहीं कर पाई है। संचार क्षेत्र को लेकर भी प्रदेश में अभी काम होना बाकी है। सरकार ने हर ब्लॉक में सेटेलाइट फोन पहुंचाए हैं। प्रदेश में कई शेडो जोन हैं और सीमांत क्षेत्रों में लोगों को आज भी नेटवर्क खोजने के लिए कई किलोमीटर का सफर करना पड़ता है। कनेक्टिविटी एक बढ़ी समस्या है। तमाम दावों के बावजूद हेली सर्विस और एयर एंबुलेंस जैसी सुविधाएं अभी प्रदेश में पहुंच नहीं पाई हैं। मानसून में हर साल सड़कें टूटने से प्रदेश को रोड कनेक्टिविटी में संकट का सामना करना पड़ता है।

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