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शिवरात्रि का व्रत करने वालों को करना चाहिए विधि-विधान का पालन

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महाशिवरात्रि के दिन चार पहर की पूजा का है विशेष महत्व

समाचार सच, अध्यात्म डेस्क। (देहरादून) महाशिवरात्रि के सम्बन्ध मे जानकारी देते हुये डॉक्टर आचार्य सुशांत राज ने बताया की महाशिवरात्रि 1 मार्च 2022 को है। इस दिन शिव भक्त पूरी आस्था के साथ भगवान भोलेनाथ को प्रसन्न करने की कोशिश करते हैं। शिव को पसंद आने वाली चीजें जैसे भांग, धतूरा और आक के फूल चढ़ाते हैं। शिवरात्रि का व्रत करने वालों को जरूरी विधि-विधान का पालन करना चाहिए।

  • शास्त्रों में कहा गया है कि शिवलिंग पर कभी भी तुलसी अर्पित नहीं करनी चाहिए। शिव को चढ़ाने वाले पंचामृत में भी तुलसी का उपयोग नहीं करें।
  • शिवलिंग पर हल्दी से अभिषेक करना भी वर्जित माना जाता है। इसके बजाय आप शिव को चंदन का तिलक लगाएं।
    शिवरात्रि के व्रत में व्रतधारियों को चावल, दाल और गेहूं का सेवन नहीं करना चाहिए। आप फल, दूध और चाय पी सकते हैं।
    -महाशिवरात्रि के व्रत की बड़ी महघ्मिा मानी जाती है। इस दघ्नि चार पहर में भोलेनाथ की पूजा का विधान है।
  • महाशिवरात्रि के पर्व की शघ्वि भक्घ्तों में बहुत धूम रहती है। मान्यता है कि इस दिन भोलेनाथ ने वैराग्य जीवन त्यागकर गृहस्थ जीवन अपनाया था।महाशिवरात्रि के दिन चार पहर की पूजा का है विशेष महत्व, मिलता है भगवान शिव का आशीर्वाद।
  • हिंदू धर्म में महाशिवरात्रि का विशेष महत्व है। यूं तो हर महीने मासिक शिवरात्रि का व्रत रखा जाता है, लेकिन फाल्गुन मास की महाशिवरात्रि का एक अलग ही महत्व है। मान्यता है कि इस महापर्व पर शिव और पार्वती का विवाह हुआ था और भोलेनाथ ने वैराग्य जीवन त्यागकर गृहस्थ जीवन अपनाया था। वहीं कुछ पौराणिक ग्रंथों में ये भी माना गया है कि इस दिन भगवान शिव दिव्य ज्योर्तिलिंग के रूप में प्रकट हुए थे। हिंदू पंचांग के अनुसार इस बार महाशिवरात्रि का पावन पर्व 1 मार्च 2022, मंगलवार को है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन विधि विधान से भगवान शिव की पूजा अर्चना करने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है और सभी कष्टों का निवारण होता है।
  • महाशिवरात्रि के दिन चार पहर की पूजा का विधान है। इस दिन रात्रि पूजन भी किया जाता है, लेकिन इससे महत्वपूर्ण चार पहर की पूजा होती है। मान्यता है कि चार पहर की पूजा करने से व्यक्ति जीवन के चारों पापों से मुक्त हो जाता है। तथा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है। महाशिवरात्रि के दिन चार पहर की पूजा संध्या काल से शुरू होकर अगले दिन ब्रह्म मुहूर्त तक की जाती है।
  • हिंदू पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास की चतुर्दशी तिथि को महाशिवरात्रि का पावन पर्व मनाया जाता है। इस बार महाशिवरात्रि 1 मार्च 2022, मंगलवार को है। चतुर्दशी तिथि सुबह 03 बजकर 16 मिनट से शुरू होकर 2 मार्च, बुधवार को सुबह 1 बजे समाप्त होगी।
  • महाशिवरात्रि के दिन प्रथम पहर की पूजा सूर्यास्त के बाद की जाती है। पहले पहर की पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 6ः21 से शुरू होकर रात में 09 बजकर 27 मिनट पर समाप्त होगी। मान्यता है कि इस दौरान विधि विधान से भगवान शिव की पूजा अर्चना करने व मंत्रों का जाप करने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है और समस्त पापों का नाश होता है। इससे आपका धर्म मजबूत होता है।
  • दूसरे पहर की पूजा रात में शुरू होती है। दूसरे पहर की पूजा का शुभ मुहूर्त रात 9 बजकर 27 मिनट से 12 बजकर 33 मिनट तक है। इस दौरान विधिवत भोलेनाथ की पूजा अर्चना के साथ दही से अभिषेक किया जाता है। ध्यान रहे दूसरे पहर में शिव मंत्रों का जाप अवश्य करें, इससे धन प्राप्ति के मार्ग में वृद्धि होती है और सुख समृद्धि की प्राप्ति होती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस पहर में भगवान शिव की स्तुति करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
  • तीसरे पहर की पूजा मध्यरात्रि में की जाती है। मान्यता है कि तीसरे पहर की पूजा में भगवान शिव को गाय का शुद्ध घी अर्पित करना चाहिए तथा इस दौरान रुद्राष्टक का पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
    चौथे पहर की पूजा अगले दिन भोर में की जाती है। पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 3.39 से 6.45 तक है। इस दौरान शहद से शिवलिंग का अभिषेक करना चाहिए। इससे सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और समस्त सुखों की प्राप्ति होती है।
    महाशिवरात्रि वर्ष 2022 में 1 मार्च मंगलवार को मनाई जाएगी महाशिवरात्रि।
    शुभ मुहुर्त –
  • अभिजीत मुहूर्त: सुबह 11.47 से दोपहर 12.34 तक।
  • विजय मुहूर्त: दोपहर 02.07 से दोपहर 02.53 तक।
    गोधूलि मुहूर्त – शाम 05.48 से 06.12 तक।
  • सांय संध्या मुहूर्त – शाम 06.00 से 07.14 तक।
    निशिता मुहूर्त – रात्रि 11.45 से 12.35 तक।
    खास संयोग – धनिष्ठा नक्षत्र में परिघ योग रहेगा। धनिष्ठा के बाद शतभिषा नक्षत्र रहेगा। परिघ के बाद शिव योग रहेगा। सूर्य और चंद्र कुंभ राशि में रहेंगे।
    पूजा विधि –
  • महाशिवरात्रि की विधि-विधान से विशेष पूजा निशिता या निशीथ काल में होती है। हालांकि चारों प्रहरों में से अपनी सुविधानुसार यह पूजन कर सकते हैं। साथ ही महाशिवरात्री के दिन रात्रि जागरण का भी विधान है।
    फाल्गुन मास के चतुर्दशी को महाशिवरात्रि का पावन पर्व मनाया जाता है।
    महाशिवरात्रि पर शिवलिंग की पूजा होती है। इस दिन मिट्टी के पात्र या लोटे में जलभरकर शिवलिंग पर चढ़ाएं इसके बाद उनके उपर बेलपत्र, आंकड़े के फूल, चावल आदि अर्पित करें। जल की जगह दूध भी ले सकते हैं।
    मंत्र – महामृत्युंजय मंत्र या शिव के पंचाक्षर मंत्र ऊँ नमः शिवाय का जाप इस दिन करना चाहिए।
    महाशिवरात्रि हिन्दुओं के सबसे बड़े पर्वों में से एक है। दक्षिण भारतीय पंचांग (अमावस्यान्त पंचांग) के अनुसार माघ माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को यह पर्व मनाया जाता है। वहीं उत्तर भारतीय पंचांग (पूर्णिमान्त पंचांग) के मुताबिक़ फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को महाशिवरात्रि का आयोजन होता है। पूर्णिमान्त व अमावस्यान्त दोनों ही पंचांगों के अनुसार महाशिवरात्रि एक ही दिन पड़ती है, इसलिए अंग्रेज़ी कैलेंडर के हिसाब से पर्व की तारीख़ वही रहती है। इस दिन शिव-भक्त मंदिरों में शिवलिंग पर बेल-पत्र आदि चढ़ाकर पूजा, व्रत तथा रात्रि-जागरण करते हैं।
    महाशिवरात्रि व्रत का शास्त्रोक्त नियम
    महाशिवरात्रि व्रत कब मनाया जाए, इसके लिए शास्त्रों के अनुसार निम्न नियम तय किए गए हैं –
  1. चतुर्दशी पहले ही दिन निशीथव्यापिनी हो, तो उसी दिन महाशिवरात्रि मनाते हैं। रात्रि का आठवाँ मुहूर्त निशीथ काल कहलाता है। सरल शब्दों में कहें तो जब चतुर्दशी तिथि शुरू हो और रात का आठवाँ मुहूर्त चतुर्दशी तिथि में ही पड़ रहा हो, तो उसी दिन शिवरात्रि मनानी चाहिए।
  2. चतुर्दशी दूसरे दिन निशीथकाल के पहले हिस्से को छुए और पहले दिन पूरे निशीथ को व्याप्त करे, तो पहले दिन ही महाशिवरात्रि का आयोजन किया जाता है।
  3. उपर्युक्त दो स्थितियों को छोड़कर बाक़ी हर स्थिति में व्रत अगले दिन ही किया जाता है।
    व्रत की पूजा-विधि –
  4. मिट्टी के लोटे में पानी या दूध भरकर, ऊपर से बेलपत्र, आक-धतूरे के फूल, चावल आदि डालकर ‘शिवलिंग’ पर चढ़ाना चाहिए। अगर आस-पास कोई शिव मंदिर नहीं है, तो घर में ही मिट्टी का शिवलिंग बनाकर उनका पूजन किया जाना चाहिए।
  5. शिव पुराण का पाठ और महामृत्युंजय मंत्र या शिव के पंचाक्षर मंत्र ऊँ नमः शिवाय का जाप इस दिन करना चाहिए। साथ ही महाशिवरात्री के दिन रात्रि जागरण का भी विधान है।
  6. शास्त्रीय विधि-विधान के अनुसार शिवरात्रि का पूजन ‘निशीथ काल’ में करना सर्वश्रेष्ठ रहता है। हालाँकि भक्त रात्रि के चारों प्रहरों में से अपनी सुविधानुसार यह पूजन कर सकते हैं।
    शिवरात्रि पर्व -चतुर्दशी तिथि के स्वामी भगवान भोलेनाथ अर्थात स्वयं शिव ही हैं। इसलिए प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मासिक शिवरात्रि के तौर पर मनाया जाता है। ज्योतिष शास्त्रों में इस तिथि को अत्यंत शुभ बताया गया है। गणित ज्योतिष के आंकलन के हिसाब से महाशिवरात्रि के समय सूर्य उत्तरायण हो चुके होते हैं और ऋतु-परिवर्तन भी चल रहा होता है। ज्योतिष के अनुसार चतुर्दशी तिथि को चंद्रमा अपनी कमज़ोर स्थिति में आ जाते हैं। चन्द्रमा को शिव जी ने मस्तक पर धारण किया हुआ है –
    -अतः शिवजी के पूजन से व्यक्ति का चंद्र सबल होता है, जो मन का कारक है। दूसरे शब्दों में कहें तो शिव की आराधना इच्छा-शक्ति को मज़बूत करती है और अन्तःकरण में अदम्य साहस व दृढ़ता का संचार करती है।
    महाशिवरात्रि की पौराणिक कथा – शिवरात्रि को लेकर बहुत सारी कथाएँ प्रचलित हैं। विवरण मिलता है कि भगवती पार्वती ने शिव को पति के रूप में पाने के लिए घनघोर तपस्या की थी। पौराणिक कथाओं के अनुसार इसके फलस्वरूप फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था। यही कारण है कि महाशिवरात्रि को अत्यन्त महत्वपूर्ण और पवित्र माना जाता है। वहीं गरुड़ पुराण में इस दिन के महत्व को लेकर एक अन्य कथा कही गई है, जिसके अनुसार इस दिन एक निषादराज अपने कुत्ते के साथ शिकार खेलने गया किन्तु उसे कोई शिकार नहीं मिला। वह थककर भूख-प्यास से परेशान हो एक तालाब के किनारे गया, जहाँ बिल्व वृक्ष के नीचे शिवलिंग था। अपने शरीर को आराम देने के लिए उसने कुछ बिल्व-पत्र तोड़े, जो शिवलिंग पर भी गिर गए। अपने पैरों को साफ़ करने के लिए उसने उनपर तालाब का जल छिड़का, जिसकी कुछ बून्दें शिवलिंग पर भी जा गिरीं। ऐसा करते समय उसका एक तीर नीचे गिर गया; जिसे उठाने के लिए वह शिव लिंग के सामने नीचे को झुका। इस तरह शिवरात्रि के दिन शिव-पूजन की पूरी प्रक्रिया उसने अनजाने में ही पूरी कर ली। मृत्यु के बाद जब यमदूत उसे लेने आए, तो शिव के गणों ने उसकी रक्षा की और उन्हें भगा दिया। जब अज्ञानतावश महाशिवरात्रि के दिन भगवान शंकर की पूजा का इतना अद्भुत फल है, तो समझ-बूझ कर देवाधिदेव महादेव का पूजन कितना अधिक फलदायी होगा।

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