तो सोशल मीडिया बना प्रचार-प्रसार का प्लेटफार्म

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-नेकी कर कुंए में डाल वाली कहावत गायब
-शहर में समाजसेवियों की भीड़

समाचार सच, हल्द्वानी। आपदा के समय जरूरतमंदों व निर्धनों की सेवा करना पुनीत कार्य हैं। लोग वास्तव में समाज सेवा कर भी रहे है। वहीं कुछ लोग समाज सेवा के नाम पर सोशल मीडिया मसलन फेसबुक और व्हाटसएप आदि पर छाये रहते हैं। देखने में आ रहा है कि आपदा के समय शहर में समाजसेवियों की भीड़ सी आ गयी है। जगह-जगह लोग समाजसेवा के नाम पर अपनी दुकान चमकाने में लगे हुए है। राशन आदि जरूरतमंदों को समान बांटने वाले लोग तुरन्त अपनी गतिविधियों को सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर शेयर कर देते है। इससे एक पंथ दो काज वाली कहावत चरितार्थ होती है। इससे एक तो उन पर समाजसेवी का ठप्पा लग जाता है और फेसबुक आदि पर मुफ्त में प्रचार भी हो जाता है।

गौरतलब है कि शहर में कुछ समाजसेवी ऐसे भी है, जो लगातार बिना किसी प्रचार-प्रसार के समाजसेवा में लगे रहते है। सबसे बड़ी बात यह है कि वह अपनी फोटो सोशल मीडिया में डालकर प्रचार नहीं करते हैं। इनमें से कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनको जन सामान्य जानता है, लेकिन यह अपना कार्य बिना किसी प्रचार-प्रसार के करते हैं। नेकी कर और कुंए में डाल वाली कहावत इन पर चरितार्थ होती है। समय के साथ समाज सेवा की परिभाषायें भी लोगों ने बदल दी है। हांलाकि यह तय है, कि जो लोग निस्वार्थ रूप से समाजसेवा करते हैं, वह लोग अपना प्रचार-प्रसार नहीं करते हैं। वहीं जो लोग समाज सेवा के माध्यम से फेमस होने के लिये किसी मंच का सहारा लेते है उनके लिए समाजसेवा प्रचार-प्रसार का माध्यम बन जाती है।

इधर देखने में आ रहा है कि लोग समाजसेवा के दौरान भी अपने राजनीतिक हितों को साधने में देर नहीं कर रहे हैं। लोग समाजसेवा के दौरान भी अपने वोटरों में भी अपना हित देख रहे है।

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समाजसेवा से भी साधे जाते है सियासी हित
भौतिकवाद के जमाने में सेवा के पीछे मेवा लेने की दार्शनिकता हावी है। आज अनेक लोग समाजसेवा के आड़ में अपने निजी और सियासी हित साधने में पीछे नहीं रहते है। आजकल अनेक लोग सामाजिक कार्यकर्ता के आड़ में सेवा करके इसी दर्शन के प्रभाव में रहते है।

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बुजुर्गों की सेवा ही सच्ची सेवा
जिसने अपने माता पिता और बुजुर्गों की सच्ची सेवा कर ली, वास्तव में वहीं सच्चा समाजसेवी है। कहीं ऐसा तो नहीं है कि हम घर में अपने माता-पिता और सास-ससुर का ख्याल तो नहीं रख रहे है, लेकिन समाज सेवा का बखान करते हुए नहीं थक रहे हैं।

काश! प्रेम से लेते सबक
बेस अस्पताल के आस-पास मरीजों व जरूरतमंदों के लिये प्रेम बेलवाल किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। किसी को खून की आवश्यकता है या दवाई की तो प्रेम बेलवाल की याद लोगों की जेहन में आ जाती है। वहीं बेलवाल सोशल मीडिया व मीडिया में छाये रहना पसंद नहीं करते है।

फेम होने को छपास फोबिया हाबी
देखने में आ रहा है कि लोगों में फेम होने के लिये सोशल मीडिया का बड़ा हाथ है। लोग अपनी अधिकतर गतिविधियों को सोशल मीडिया में डाले बिना नहीं रहते। मनोचिकित्सा का कहना है कि यह भी एक प्रकार फोबिया है।

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