तीजन बाई: संघर्ष, कला और साहस की अमर गाथा

खबर शेयर करें

समाचार सच, जानकारी। चलिए आज आपको तीजन बाई के बारे में बताते हैं। शायद आज की नई पीढ़ी उनके बारे में बहुत कम जानती है। कई लोग तो समय के साथ उन्हें भूल भी गए होंगे। लेकिन भारतीय लोककला के इतिहास में उनका नाम हमेशा सम्मान और गर्व के साथ लिया जाएगा। पद्मश्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण जैसे देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों से सम्मानित तीजन बाई ने अपने संघर्ष, प्रतिभा और अदम्य साहस से पूरी दुनिया में छत्तीसगढ़ की पारंपरिक लोकगायन शैली पंडवानी को नई पहचान दिलाई।

छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के एक छोटे से गांव गनियारी में जन्मी तीजन बाई का बचपन बेहद साधारण परिस्थितियों में बीता। वर्ष 1960 के दशक में, जब वह लगभग 13 वर्ष की थीं, तब उन्होंने एक अस्थायी मंच पर पहली बार महाभारत की कथा सुनी। उस समय शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि आदिवासी समुदाय की यह छोटी-सी लड़की एक दिन पूरी दुनिया में पंडवानी की सबसे बड़ी पहचान बन जाएगी।

तीजन बाई को पंडवानी की शिक्षा उनके नाना बृजलाल से मिली। उन्होंने बचपन से ही महाभारत की कथाओं को आत्मसात किया। जब वे मंच पर अपने तंबूरा के साथ उतरती थीं और पूरे जोश, अभिनय तथा प्रभावशाली आवाज़ में दुःशासन वध, कर्ण वध, द्रौपदी चीरहरण जैसे प्रसंगों का गायन करती थीं, तो ऐसा लगता था मानो महाभारत के सभी पात्र दर्शकों के सामने जीवंत हो उठे हों। उनकी प्रस्तुति केवल गायन नहीं, बल्कि अभिनय, भाव और ऊर्जा का अद्भुत संगम होती थी।

यह भी पढ़ें -   रोजाना 30 मिनट रनिंग करने से क्या क्या फायदे होते हैं

लेकिन उनका जीवन केवल कला की सफलता की कहानी नहीं, बल्कि संघर्षों की भी मिसाल है। बचपन में ही उनका विवाह कर दिया गया था। सामाजिक रूढ़ियों और कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने अपनी कला का साथ नहीं छोड़ा। लगभग 18 वर्ष की उम्र में उन्होंने दूसरा विवाह किया, जिससे उन्हें तीन पुत्र हुए। लेकिन पति की शराब की लत और पारिवारिक प्रताड़ना के कारण उन्हें अलग होना पड़ा। इसके बाद उन्होंने हारमोनियम वादक तुकाराम वर्मा से तीसरा विवाह किया, जिन्होंने उनके कला जीवन और पेशेवर कार्यों को संभालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

तीजन बाई के जीवन का सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सामने प्रस्तुति देने का अवसर मिला। उनकी अद्भुत कला से प्रभावित होकर उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली और इसके बाद उन्होंने देश-विदेश में अनेक मंचों पर पंडवानी की शानदार प्रस्तुतियां दीं। उन्होंने दुनिया को यह बताया कि लोककला केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि संस्कृति, इतिहास और परंपरा की जीवंत धरोहर होती है।

यह भी पढ़ें -   सीमा से सकुशल लौटे जवान की घर में थम गई सांसें: लेह-लद्दाख की कठिन ड्यूटी निभाकर आए सैनिक की अचानक मौत, परिवार पर टूटा दुखों का पहाड़

उनकी कला और योगदान के सम्मान में उन्हें पद्मश्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण सहित अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। उनके सम्मान में उनके पैतृक गांव गनियारी के एक सरकारी स्कूल का नाम भी उनके नाम पर रखने का निर्णय लिया गया।

5 जुलाई 2026 को 70 वर्ष की आयु में रायपुर एम्स में लंबी बीमारी के बाद तीजन बाई ने अंतिम सांस ली। उनके निधन से भारतीय लोककला जगत ने अपनी एक अमूल्य धरोहर खो दी। उनका अंतिम संस्कार उनके पैतृक गांव गनियारी में पूरे सम्मान के साथ किया गया।

तीजन बाई भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज़, उनकी कला और उनका संघर्ष आने वाली पीढ़ियों को हमेशा प्रेरित करता रहेगा। उन्होंने यह सिद्ध किया कि यदि प्रतिभा के साथ साहस, मेहनत और आत्मविश्वास हो, तो एक छोटे से गांव की बेटी भी पूरी दुनिया में अपनी संस्कृति का परचम लहरा सकती है। भारतीय लोककला के इतिहास में तीजन बाई का नाम सदैव स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा।

Ad AdAd Ad Ad Ad AdAd Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad

सबसे पहले ख़बरें पाने के लिए -

👉 हमारे व्हाट्सएप ग्रुप से जुड़ें

👉 फेसबुक पर जुड़ने हेतु पेज़ लाइक करें

👉 यूट्यूब चैनल सबस्क्राइब करें

हमसे संपर्क करने/विज्ञापन देने हेतु संपर्क करें - +91 70170 85440