समाचार सच, अध्यात्म डेस्क। सर्वपितृ अमावस्या पर तर्पण, पिंडदान और पंचबलि कर्म करने के साथ ही देवताओं और पितरों के भोग को अग्नि को समर्पित किया जाता है। पहले उनके लिए पत्ते पर अलग से भोजन निकाल कर रखा जाता है और बाद में वैदिक मंत्रों के साथ उसका होम करते हैं। इसी के साथ यदि आप निम्नलिखित 5 कार्य करते हैं तो कालसर्पदोष, पितृदोष और शनिदोष से मिलेगी मुक्ति मिलेगी।
दीपदान
सर्वपितृ अमावस्या के दिन कुतुप काल और संध्या के समय दीपक जलाकर पितरों को आने-जाने का मार्ग दिखाएं। सूर्यास्त के बाद विशेष रूप से दक्षिण दिशा में तिल के तेल के 16 दीपक जलाना शुभ माना जाता है। दीप जलाने के साथ पूड़ी व मिष्ठान उचित स्थान पर रखें, ताकि पितृगण भूखे न लौटें और संतुष्ट होकर परिवार को सुख, समृद्धि और खुशहाली का आशीर्वाद दें। मान्यता है कि इस दिन सभी पितर आपके द्वार पर उपस्थित होते हैं और फिर पितृ लोक लौट जाते हैं। श्रद्धापूर्वक दीपदान करने से पितरों को सद्गति मिलती है और परिवार की अकाल मृत्यु से रक्षा होती है।
कर्पूर
इस दिन कर्पूर जलाने से देवदोष और पितृदोष समाप्त हो जाता है। गुड़ और घी के मिश्रण को कंडे (उपले) पर चलाने से भी देव और पितृदोष दूर होते हैं।
पीपल
पीपल या बरगद के वृक्ष में जल चढ़ाते रहना चाहिए और दीप चलाना चाहिए। पीपल के वृक्ष के लिए अलग से अन्न और जल निकाला जाता है। पीपल के भोग को उस वृक्ष के नीचे रखा जाता है। इससे शनिदोष और पितृदोष का शमन होता है।
शिव और यम पूजा
इस दिन प्रदोष काल में शिवजी की और यमदेव की विधिवत पूजा करने से कालसर्पदोष से मुक्ति मिलती है।
अन्न दान
इस दिन गाय, कौवा, कुत्ता, चींटी, मछली, गरीब, मजदूर, अंधे, विधवा, ब्राह्मण, भांजा, नाती और जमाई को भोजन कराने से पितृदोष, कालसर्पदोष और शनिदोष सहित सभी ग्रहण दोष दूर होते हैं।

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