समाचार सच, हल्द्वानी। नैनीताल हाई कोर्ट ने आदेश दिया था कि बनभूलपुरा इलाके की गफूर बस्ती, ढोलक बस्ती व इंदिरा कालोनी में रेलवे की 28 एकड़ जमीन से अतिक्रमण हटाया जाए। अतिक्रमण की जद में 4365 मकान आ रहे हैं। इस संभावित कार्रवाई से प्रभावित होने वाले लोगों की संख्या लगभग 40 से 50 हजार है। कुल 2.2 किमी. के इलाके से अतिक्रमण हटाया जाना है।
आपको बता दें हल्द्वानी (Haldwani) के कांग्रेस विधायक सुमित हृदयेश व कुछ अन्य पक्षकार इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे और अदालत से जल्द सुनवाई करने की गुहार लगाई थी।
इससे पूर्व अतिक्रमण हटाने को लेकर रेलवे की ओर से अखबार में विज्ञापन भी प्रकाशित कर दिया गया था। इसमें कहा गया है कि रेलवे की जमीन पर एक हफ्ते के बाद अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई की जाएगी। अतिक्रमण की जद में आने वाली सभी संपत्तियों को गिरा दिया जाएगा। गफूर बस्ती, ढोलक बस्ती, इंदिरा कालोनी का यह इलाका हल्द्वानी रेलवे स्टेशन के बिल्कुल नजदीक बसा हुआ है।
दिसंबर में नैनीताल हाई कोर्ट (Nainital High Court) का आदेश आने के बाद से ही बनभूलपुरा में हजारों लोग सड़कों पर बैठे हुए थे। इनमें महिलाएं, छोटे बच्चे, बुजुर्ग, नौजवान शामिल हैं।
उनके धरने और प्रदर्शन की तस्वीरें सोशल मीडिया पर जबरदस्त वायरल हैं। उत्तराखंड में मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के साथ ही समाजवादी पार्टी, एआईएमआईएम, वामपंथी संगठनों, सामाजिक संगठनों और छात्र संघ ने भी इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया है।
क्या है रेलवे का दावा ?
आपको बता दें साल 2016-17 में रेलवे और जिला प्रशासन ने इस इलाके में एक संयुक्त सर्वे किया था और उसके बाद 4365 संपत्तियों को अतिक्रमण बताया था। रेलवे का कहना है कि उसके पास मौजूद पुराना नक्शा, 1959 का नोटिफिकेशन, 1971 का रेवेन्यू रिकॉर्ड और 2017 के सर्वे के नतीजों के मुताबिक यह जमीन उसकी है। रेलवे ने हाई कोर्ट से कहा था कि कोई भी अतिक्रमणकारी उस जमीन पर दावा करने के लिए कोई कानूनी दस्तावेज पेश नहीं कर सका। कोर्ट ने इस मामले में सभी पक्षों को सुनने के बाद रेलवे के पक्ष में फैसला सुनाया।
हाई कोर्ट ने अतिक्रमण हटाने के काम में पुलिस और प्रशासन से रेलवे का सहयोग करने के लिए कहा है। लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि वे सालों से सीवर लाइन, बिजली, पानी आदि चीजों का बिल देते हुए आ रहे हैं। लोगों ने कहा है कि वे अपनी जान भी दे देंगे लेकिन अपने घरों को छोड़कर नहीं जाएंगे।
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान क्या हुआ ?
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट कोलिन गोंजाल्विस ने हाईकोर्ट के फैसले को अदालत के सामने रखा और कहा कि यह जमीन राज्य सरकार की है। बेंच की ओर से पूछा गया कि क्या इस मामले में सीमांकन किया जा चुका है, इस पर एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि हां सीमांकन किया गया था, रेलवे स्टेशन के विस्तार के लिए जगह ही नहीं है और यहां पर 4000 से ज्यादा अनाधिकृत लोगों ने कब्जा किया हुआ है। उन्होंने कहा कि हाई कोर्ट के आदेश पर कोई स्टे नहीं है।
- जस्टिस ओका ने कहा कि लोग वहां 50 साल और उससे भी ज्यादा समय से रह रहे हैं।
- एएसजी ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि इस मामले में राज्य सरकार और रेलवे का यही स्टैंड है कि यह जमीन रेलवे की है। उन्होंने इस संबंध में सार्वजनिक परिसर अधिनियम के तहत बेदखल करने से जुड़े कई आदेश भी अदालत के सामने रखे।
- याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट प्रशांत भूषण ने कहा कि यह सभी आदेश एकपक्षीय थे और कोरोना काल के दौरान दिए गए थे।
- एएसजी ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि रेलवे को अपनी सुविधाओं का विस्तार करने के लिए जमीन की जरूरत है। उन्होंने कहा कि हल्द्वानी उत्तराखंड के रेल ट्रैफिक के लिए गेटवे की तरह है।
- जस्टिस कौल ने कहा कि इसमें दिक्कत वाली बात यह है कि लोगों ने नीलामी में जमीन खरीदी है और 1947 के बाद उन्हें यहां कब्जा मिला है। लोग यहां पर 60-70 सालों से रह रहे हैं इसलिए पुनर्वास का काम किया जाना चाहिए।
- एएसजी भाटी ने कहा कि लोगों का यह दावा है कि यह उनकी जमीन है और वह किसी तरह के पुनर्वास की मांग नहीं कर रहे हैं।
- जस्टिस ओका ने कहा कि किसी को इन लोगों की बात को जरूर सुनना चाहिए। जस्टिस कौल ने कहा कि सभी को एक तरह से नहीं देखा जा सकता है, कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनके लिए मानवीय पहलू पर विचार करने की जरूरत है और उनके दस्तावेजों को देखा जाना चाहिए।
What is the full story of Haldwani railway encroachment case, know what happened during SC hearing?



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