अनेक पत्रकारों को पड़ रहा भारी लॉकडाउन
समाचार सच, हल्द्वानी । रात दिन खटकर समाज के दुख दर्दों को उकेरने वाले पत्रकार कभी खबरों की सुर्खियां नहीं बनते। इधर पत्रकारों के कल्याण के लिए भले ही तमाम वादे किये जाते हैं, लेकिन अभी तक उस आदेश को अमलीजाता नहीं पहनाया गया है। हालाकि कुछ दिनों पूर्व राज्य सरकार ने पत्रकारों के कल्याण के लिए कुछ कदम उठाने का वादा किया था, लेकिन उसमें भी मान्यता या गैर मान्यता का मामला आ सकता है। इस स्थिति केा लेकर तमाम पत्रकार असमसंज में हैं।
इधर सरकार निर्धारित मापदंडों पर खरा उतरने वाले पत्रकारों को मान्यता देती है। इन पत्रकारों को ही शासन द्वारा तमाम सुविधाएं प्रदान की जाती है। एक जिले में इनकी संख्या अलग-अलग हो सकती है। राज्य में वर्तमान में मान्यता प्राप्त पत्रकारों की संख्या देहरादून व हरिद्वार में सर्वाधिक है। इसके इतर उन पत्रकारों के लिए सुविधाएं नगण्य है, जो मान्यता प्राप्त नहीं है। इनमें से अधिकतर पत्रकार वे हैं, जो किसी दैनिक, साप्ताहिक, मासिक या पोर्टलों से जुड़ा है। हालाकि दैनिक पेपरों में अधिकतर पत्रकार वेतन पाते है। लेकिन अन्य कलमकार न्यूनतम मानदेय या फ्री में काम वाले होते है।
लाकडाउन के चलते बढ़ा संकट
हल्द्वानी। कुछ पत्रकार ऐसे हैं, जो कलम की जीविका बनाये रखने के साथ-साथ अपनी रोजी-रोटी के लिए छोटे-मोटे धंधे कर रहे होते है। इधर लाकडाउन के चलते उनके काम ठप है। ऐसी स्थिति में उसके समक्ष रोजी-रोटी का संकट भी हो गया है।
स्वाभिमान भी आता है आड़े
हल्द्वानी। कहीं-कहीं पत्रकारों के समक्ष स्वाभिमान भी आड़े आ जाता हहै। ऐसी परिस्थिति में चाहने के बावजूद वह किसी के आगे हाथ फैलाना उचित नहीं मानता। आर्थिक स्थिति कमजोर होने के बाद भी वह झुकना पसन्द नहीं करता है।
जितने पत्रकार उतने संगठन
हल्द्वानी। पत्रकार सरकार के समक्ष अपनी मांग रख सकता है, लेकिन पत्रकारों के इतने संगठन है कि लगभग हर पत्रकार अपने आप में संगठन हे। इसलिए उनमें एकता का अभावा होने के कारण वह अपनी मांग मजबूती से नहीं रख पाते है।
पान सिंह जैसे पत्रकारों की नहीं ली सुध
हल्द्वानी। कलम के धनी पान सिंह बिष्ट लगभग 15 वर्ष पूर्व सड़क दुर्घटना में घायल हो गये थे। उनकी सुध भी एकाध पत्रकारों के अलावा किसी ने नहीं ली। पत्रकारिता में यही नियम है कि आप लाइन से हटे तो आपको पूछने वाला कोई नहीं है।
बीमार बिटिया के लिए नहीं उठे हाथ
हल्द्वानी। नगर में भले ही तमाम समाजसेवी व राजनेता हैं, लेकिन बीमार बिटिया वन्दना के लिए किसी भी समाजसेवी ने हाथ नहीं उठाये, पत्रकार धीरज भट्ट की बेटी वन्दना भट्ट का पिछले एक वर्ष से दिल्ली में इलाज चल रहा है, लेकिन किसी भी जनप्रतिनिधि या समाजसेवी ने एक पैसे तक की सहायता नहीं की।
किराये के लिए किसका मुंह ताके पत्रकार
हल्द्वानी। रोजी-रोटी नहीं होने के कारण उन पत्रकारों के लिए बड़ी परेशानी है, जो किराये के मकान में रहते है। अगर पैसे नहीं देंगे तो फिर मकान खाली करना पड़ेगा। क्या सरकार कोई राहत देगी।
राजनेताओं व समाज सेवियों ने भी नहीं बढ़ाये मद्द के हाथ
हल्द्वानी में राजनेता व समाजसेवी लोगों की खबरें सुर्खियों में है। कोई राशन बांट रहा तो कोई अन्य वस्तु बांट कर अपनी वाहवाही कर रहा है। इधर हल्द्वानी में शायद किसी जरूरतमंद पत्रकार की सहायता के लिए राजनेता और समाजसेवी शायद ही आगे आये हो। कोई पत्रकार आर्थिक रूप से परेशान है तो कोई बच्चों की दवाइयां नहीं खरीद पा रहा है। राजनेता व समाजसेवी कब इन पर नजरे इनायत करेंगे।
वीवीआईपी भी नहीं रखते नजरे इनायत
हल्द्वानी। शहर में तमाम वीवीआईपी लोग निवास करते हैं, लेकिन इक्का-दुक्का मामलों को छोड़कर पत्रकारों के मदद के लिए वे आगे नहीं आये। यह लोग अपनी खबर छपाने के लिए पत्रकारों से सम्पर्क करते हैं, लेकिन पत्रकारों के मदद के लिए आगे आना उचित नहीं समझते। इनकी नजरों में पत्रकार केवल खबरों तक सीमित है।

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