संतान के दीर्घ आयु एवं सुखी जीवन के लिए रखे अहोई अष्टमी व्रत

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समाचार सच, अध्यात्म डेस्क। देहरादून। डॉक्टर आचार्य सुशांत राज ने जानकारी देते हुये बताया की हिन्दू धर्म में जिस प्रकार पति की लंबी आयु के लिए कई व्रत हैं, ठीक उसी तरह संतान के दीर्घ आयु एवं सुखी जीवन के लिए भी व्रत हैं अहोई अष्टमी व्रत। हिन्दू कैलेंडर के अनुसार, कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को संतान के सुखी और समृद्धि जीवन के लिए अहोई अष्टमी को व्रत रखा जाता है। यह व्रत करवा चौथ के 4 दिन बाद और दिवाली से 8 दिन पूर्व होता है। अहोई अष्टमी के दिन माताएं व्रत रखती हैं और अहोई माता की विधिपूर्वक पूजा करती हैं। अहोई माता की कृपा से संतान सुखी, आरोग्य और दीर्घायु होती है।
अहोई अष्टमी के दिन अहोई माता की पूजा का मुहूर्त शाम को 01 घंटे 17 मिनट का है। 28 अक्टूबर को शाम 05 बजकर 39 मिनट से शाम 06 बजकर 56 मिनट तक अहोई अष्टमी की पूजा का शुभ मुहूर्त है।
हिंदू कैलेंडर के अनुसार कार्तिक मास में कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को अहोई अष्टमी का व्रत रखा जाता है। इस साल अहोई अष्टमी का व्रत 28 अक्टूबर गुरुवार के दिन रखा जाएगा। ये व्रत संतान की लंबी आयु और संतान प्राप्ति के लिए रखा जाता है. अहोई अष्टमी का व्रत करवा चौथ के तीन दिन बाद पड़ता है और इस दिन अहोई माता की विधि-विधान से पूजा की जाती है। मान्यता है कि इस दिन व्रत करने से अहोई माता प्रसन्न होकर अपने भक्तों को आशीर्वाद देती हैं. अघ्होई अष्टमी का व्रत संतान की लंबी आयु और संतान प्राप्ति के लिए रखा जाता है। इस दिन महिलाएं निर्जला व्रत करती हैं और अहोई माता की विधि-विधान से पूजा-अर्चना करती हैं। कहा जाता है कि अहोई माता की पूजा करने से मां पार्वती अपने पुत्रों की तरह की आपके बच्चों की भी रक्षा करती हैं। इस व्रत में शाम को तारों अर्घ्य दिया जाता है और इसके बाद ही व्रत पूरा होता है।
अहाई अष्टमी के दिन अहोई माता की पूजा की जाती है लेकिन कहा जाता है कि इससे पहले भगवान गणेश की पूजा जरूर करनी चाहिए।
आमतौर पर कोई भी व्रत चंद्रमा को देखकर खोला जाता है, लेकिन ध्यान रखें कि अहोई अष्टमी का व्रत तारों को देखकर खोला जाता है. तारें निकलने के बाद अहोई माता की पूजा की जाती है।
इस व्रत में कथा सुनते समय हाथों में 7 प्रकार के अनाज होने चाहिए और पूजा के बाद यह अनाज गाय खिला दें। अहोई अष्टमी का व्रत बच्चों के लिए किया जाता है और मान्यता है कि पूजा के समय बच्चों का साथ जरूर बिठाना चाहिए। इस व्रत को संतान प्राप्ति के लिए भी किया जाता है।

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