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अन्न का उत्पादन नहीं होगा तो लोगों को खेतों में रोजगार कहां से मिलेगा : रावत

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समाचार सच, देहरादून। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने आज अपने फेसबुक पेज मे एक पोस्ट मे पलायन के दर्द को उजागर किया। उन्होंने अपनी पोस्ट मे लिखा की पहाड़ और गाँव से पलायन को रोकने के लिए आवश्यक है कि हम ग्रामीण खेती को चकबंदी के द्वारा न केवल नया स्वरुप दें, बल्कि वहां उत्पादित होने वाले अन्न की खपत को भी बढ़ाये। उन्होंने यह भी लिखा की जब उनकी सरकार थी तो उन्होंने फल और सब्जियों की खपत को बढ़ाया था।

श्री रावत ने कहा की मेरी सरकार ने इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए मंडुआ, झंगोरा, कौणी, गहत, राजमा, फाफर, मिर्च आदि उत्पादों का खरीद मूल्य निर्धारण की पॉलिसी बनाई और साथ-साथ इनके उत्पादकों को बोनस योजना से लाभान्वित किया। 1 कुंटल मंडुआ पैदा करने पर 700 का मंडुआ बोनस, 1 कुंटल मिर्च पर 1000 का बोनस। इसी तरीके से अन्य फसलों पर भी उत्पादन पर बोनस की नीति ने लोगों को प्रोत्साहित किया कि वो इन अनाजों और दालों का उत्पादन बढ़ाएं। आज मंडुवे की बड़ी मांग है, आज दूसरे उत्तराखंडी दालों, झंगोरे, कौणी के चावल की भी बड़ी मांग है। राज्य सरकार में आये बदलाव के बाद भाजपा सत्ता में आई। भाजपा ने गाँव के इन उत्पादों के खरीद की नीति को भी बदला और साथ-साथ बोनस देने की नीति को भी बंद कर दिया। बिना बोनस के परंपरागत फसलें, लागत के मूल्य को भी अदा नहीं कर पाती है, तो लोगों को आप इन अनाजों को उत्पादित करने के लिए कैसे प्रोत्साहित करेंगे? और यदि अन्न का उत्पादन नहीं होगा तो लोगों को खेतों में रोजगार कहां से मिलेगा? जब रोजगार नहीं होगा, तो पलायन अवश्य सम्भावी है। इसलिये मैं कहता हूँ “तीन तिगाड़ा-काम बिगाड़ा” अब उत्तराखंड में नहीं आएगी, भाजपा दोबारा।

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