उत्तराखण्ड की औषधीय विरासत को मिला नया दस्तावेज, मुक्त विश्वविद्यालय में जड़ी-बूटियों पर आधारित संदर्भ पुस्तक का विमोचन

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वृहद वृक्षारोपण अभियान के साथ पर्यावरण संरक्षण का संकल्प, विशेषज्ञों ने औषधीय पौधों के वैज्ञानिक संरक्षण पर दिया जोर

समाचार सच, हल्द्वानी।
उत्तराखण्ड की जैव विविधता और औषधीय वनस्पतियों को वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में सोमवार को उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय में एक महत्वपूर्ण पहल की गई। विश्वविद्यालय परिसर में आयोजित कार्यक्रम के दौरान राज्य की व्यावसायिक एवं औषधीय जड़ी-बूटियों पर आधारित पुस्तक “ग्लॉसरी ऑफ कमर्शियल मेडिसिनल हर्ब्स ऑफ उत्तराखण्ड” का विमोचन किया गया। विशेषज्ञों ने इसे शोध, शिक्षा, कृषि और हर्बल उद्योग से जुड़े लोगों के लिए उपयोगी संदर्भ ग्रंथ बताया।

कार्यक्रम की शुरुआत वृहद वृक्षारोपण अभियान से हुई, जिसमें कुलपति प्रो. नवीन चन्द्र लोहनी, योजना बोर्ड के सदस्य प्रो. प्रदीप कुमार जोशी, मुख्य वन संरक्षक (कुमाऊँ) डॉ. तेजस्विनी अरविन्द पाटिल (आईएफएस) तथा मोनार्ड इंडस्ट्रीज के निदेशक डॉ. बी.एस. कालाकोटी सहित विश्वविद्यालय परिवार ने पौधारोपण कर हरित उत्तराखण्ड के निर्माण का संकल्प लिया।

पुस्तक के सह-लेखक डॉ. बी.एस. कालाकोटी ने बताया कि पुस्तक में उत्तराखण्ड की व्यावसायिक दृष्टि से महत्वपूर्ण औषधीय जड़ी-बूटियों का सरल एवं प्रमाणिक विवरण संकलित किया गया है। उनका कहना था कि यह पुस्तक विद्यार्थियों, शोधार्थियों, कृषकों, उद्यमियों और औषधीय पौधों के क्षेत्र में कार्य करने वाले विशेषज्ञों के लिए मार्गदर्शक साबित होगी।

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मुख्य वन संरक्षक डॉ. तेजस्विनी अरविन्द पाटिल ने कहा कि जैव विविधता का संरक्षण केवल पौधे लगाने तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके वैज्ञानिक संरक्षण और संवर्धन की भी उतनी ही आवश्यकता है। उन्होंने विश्वविद्यालय और वन विभाग के बीच औषधीय पौधों के संरक्षण को लेकर संयुक्त प्रयासों की आवश्यकता पर बल दिया।

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मुख्य अतिथि प्रो. प्रदीप कुमार जोशी ने पुस्तक को उत्तराखण्ड की प्राकृतिक धरोहर का महत्वपूर्ण दस्तावेज बताते हुए इसका हिन्दी संस्करण प्रकाशित करने का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि इस तरह के प्रकाशन राज्य की पारंपरिक वनस्पति ज्ञान प्रणाली को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाएंगे।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. नवीन चन्द्र लोहनी ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण और औषधीय वनस्पतियों के संरक्षण को विश्वविद्यालय अपनी सामाजिक जिम्मेदारी का हिस्सा मानता है। उन्होंने कहा कि वृक्षारोपण और ज्ञान संरक्षण दोनों मिलकर भविष्य की पीढ़ियों के लिए प्राकृतिक संपदा को सुरक्षित रखने का मजबूत माध्यम बन सकते हैं।

इस अवसर पर विश्वविद्यालय के शिक्षक, अधिकारी, कर्मचारी, शोधार्थी एवं विद्यार्थियों ने भी बड़ी संख्या में सहभागिता कर पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया।

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