46 साल बाद लौटा गुमशुदा बेटा, आवाज सुनते ही मां ने पहचान लिया; साधु के भेष में देख छलक पड़े आंसू

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समाचार सच, पिथौरागढ़ डेस्क। ममता की ताकत और मां-बेटे के अटूट रिश्ते की मिसाल बेरीनाग क्षेत्र के दौलीगाड़ गांव में देखने को मिली, जहां 46 साल पहले लापता हुआ बेटा साधु के वेश में अचानक घर पहुंचा तो 85 वर्षीय मां ने उसे केवल आवाज से पहचान लिया। बेटे को सामने देखकर मां की आंखों से आंसू बह निकले, जबकि वर्षों बाद घर लौटे बेटे की आंखें भी नम हो गईं।

बेरीनाग के ग्राम पंचायत पौषा पोस्ताला स्थित दौलीगाड़ गांव निवासी बुद्धि बल्लभ उपाध्याय करीब 46 वर्ष पहले, महज 15 साल की उम्र में घर छोड़कर चले गए थे। परिवार ने उन्हें खोजने के लिए हरसंभव प्रयास किए, लेकिन उनका कोई पता नहीं चल सका। इस बीच वर्ष 2005 में उनके पिता तारा दत्त उपाध्याय का निधन हो गया, लेकिन मां नंदी देवी ने बेटे के लौटने की उम्मीद कभी नहीं छोड़ी।

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4 जून को एक साधु भिक्षा मांगते हुए नंदी देवी के घर पहुंचा। वृद्ध मां ने उसकी आवाज सुनी और कुछ देर तक उसका चेहरा निहारती रहीं। अचानक उन्हें एहसास हुआ कि यह कोई और नहीं, बल्कि उनका बिछड़ा बेटा बुद्धि बल्लभ है। पहचान होते ही मां ने बेटे को गले से लगा लिया और दोनों भावुक होकर रो पड़े। यह दृश्य देखकर आसपास मौजूद ग्रामीणों की आंखें भी नम हो गईं।

बुद्धि बल्लभ ने बताया कि घर छोड़ने के बाद उन्होंने ट्रकों और अन्य वाहनों में काम किया। बाद में उनका रुझान धार्मिक जीवन की ओर बढ़ा और वे विभिन्न मंदिरों में रहने लगे। हरिद्वार से होते हुए वे राजस्थान के बीकानेर पहुंचे, जहां उन्होंने साधु जीवन अपना लिया। इसी दौरान उन्होंने अपना नाम बदलकर ‘बुद्धनाथ’ रख लिया और वर्षों से साधु के रूप में जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

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उन्होंने बताया कि साधु परंपरा के अनुसार अपनी मां के हाथों भिक्षा लेने की इच्छा से वे अपने पैतृक घर पहुंचे थे। वर्तमान में उनकी 12 फीट से अधिक लंबी जटाएं हैं, जिन्हें देखने और उनका आशीर्वाद लेने के लिए गांव में लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी।

घर पहुंचने पर बुद्धि बल्लभ ने अपने पिता, भाई, चाचा और अन्य परिजनों के बारे में जानकारी ली। उनके चचेरे भाई आनंद बल्लभ उपाध्याय भी परिवार सहित उनसे मिलने पहुंचे, जिन्हें उन्होंने तुरंत पहचान लिया। वर्षों पुराने पारिवारिक प्रसंगों और यादों को साझा करते हुए पूरा परिवार भावुक नजर आया।

बुद्धि बल्लभ उर्फ बुद्धनाथ ने बताया कि वह कुछ दिन अपनी मां के साथ समय बिताएंगे और इसके बाद वापस बीकानेर लौट जाएंगे। वहीं नंदी देवी का कहना है कि उन्हें हमेशा विश्वास था कि उनका बेटा एक दिन जरूर घर लौटेगा, और आखिरकार उनका यह इंतजार 46 साल बाद पूरा हो गया।

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