श्रावणी उपाकर्म और संस्कृत दिवस पर गूंजा संस्कृत का गौरव, शिक्षाविद् चंद्रशेखर भट्ट सम्मानित

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समाचार सच, हल्द्वानी।
श्री गिरिजा देवी सनातन सेवा समिति, हल्द्वानी-नैनीताल, उत्तराखंड के तत्वावधान में श्रावणी उपाकर्म एवं संस्कृत दिवस समारोह श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया गया। छड़ायल सुयाल स्थित श्री शिव धाम मंदिर में आयोजित कार्यक्रम में वैदिक परंपराओं के साथ श्रावणी उपाकर्म संपन्न कराया गया। इसके साथ ही संस्कृत भाषा के महत्व पर संस्कृत गोष्ठी का आयोजन किया गया।

प्रो. डॉ. एसडी तिवारी के निर्देशन में डॉ. नवीन चंद्र जोशी ने वैदिक विधि-विधान से श्रावणी उपाकर्म कराया। कार्यक्रम की शुरुआत गणेश पूजन एवं पंचांग पूजन से हुई। इसके बाद कलश स्थापना, सप्तऋषि पूजन, रक्षा विधान, वेदोक्त ऋषियों का तर्पण एवं वंशोक्त ऋषियों का पूजन किया गया। धार्मिक अनुष्ठान के उपरांत यज्ञोपवीत धारण कराया गया और रक्षा बंधन की परंपरा निभाई गई।

श्रावणी उपाकर्म में आचार्य गोविंद बल्लभ जोशी, मंजीत सती, संजय शास्त्री, विनोद चंद्र, चंद्रशेखर भट्ट, भावेश जोशी, रितेश जोशी, योगेश सहित अन्य श्रद्धालुओं ने सहभागिता की।

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संस्कृत को बताया ज्ञान और संस्कृति की आधार भाषा
समारोह के दूसरे चरण में समिति की ओर से संस्कृत गोष्ठी आयोजित की गई। वक्ताओं ने संस्कृत भाषा के ऐतिहासिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व पर प्रकाश डाला।

मुख्य वक्ता डॉ. नवीन चंद्र जोशी ने कहा कि संस्कृत को देवभाषा के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है और भारतीय ज्ञान परंपरा में इसका महत्वपूर्ण स्थान है। उन्होंने कहा कि संस्कृत में ज्ञान-विज्ञान, दर्शन, साहित्य और संस्कृति का विशाल भंडार मौजूद है। संस्कृत के अध्ययन से भारतीय परंपराओं और संस्कृति को समझने में सहायता मिलती है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रो. डॉ. एसडी तिवारी ने कहा कि वेद और पुराण सहित भारतीय ज्ञान परंपरा के अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथ संस्कृत में रचे गए हैं। उन्होंने कहा कि संस्कृत भाषा व्यक्ति को संस्कार और संस्कृति से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है तथा मानवता के निर्माण में भी इसका योगदान महत्वपूर्ण है।

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शिक्षाविद् चंद्रशेखर भट्ट को किया सम्मानित
कार्यक्रम के दौरान सामाजिक कार्यों तथा संस्कृत और भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार में योगदान के लिए शिक्षाविद् चंद्रशेखर भट्ट को सम्मानित किया गया। समिति के संरक्षक डॉ. एसडी तिवारी एवं आयोजक मंडल की ओर से उन्हें माल्यार्पण कर अंगवस्त्र प्रदान किया गया।

सम्मान के बाद चंद्रशेखर भट्ट ने कहा कि संस्कृत केवल धार्मिक या शैक्षणिक विषय तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि इसे जन-जन की भाषा बनाने के लिए सामूहिक प्रयास किए जाने चाहिए। उन्होंने संस्कृत के प्रचार-प्रसार और नई पीढ़ी को इससे जोड़ने की आवश्यकता पर जोर दिया।

समारोह में वक्ताओं ने कहा कि संस्कृत भाषा भारतीय संस्कृति और परंपरा की महत्वपूर्ण धरोहर है। इसके संरक्षण, संवर्धन और प्रचार-प्रसार के लिए समाज के विभिन्न वर्गों को आगे आना चाहिए।

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