अंतिम सांसे गिन रहा है पहाड़ का ताम्र उद्योग

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समाचार सच, हल्द्वानी (धीरज भट्ट)। पहाड़ में तांबा उद्योग की चमक फीकी पड़ने लगी है या यूं कहे कि यहां पर ताम्र उद्योग अन्तिम सांसे ले रहा है। लगभग चार दशक पुराने इस उद्योग में लगे पुश्तैनी कारीगर यहां से पलायन कर गये है। बाजार में प्लास्टिक या अन्य सस्ते सामान आज जाने से तांबे से बनी वस्तुएं शोपीस बनकर रह गये हैं। गौरतलब है कि उत्तराखण्ड में ताम्र उद्योग का इतिहास 400 से 500 वर्ष पुराना है। अल्मोड़ा इसका मुख्य केन्द्र रहा है। ताम्रनगरी के नाम से जाना जाता है। अल्मोड़ा को ताम्र मोहल्ला तो इसका मुख्य केन्द्र हुआ करता था। यहां पर लगभग तीस वर्ष पूर्व तक इस मोहल्ले में 70 से अधिक परविार इस व्यवसाय को अपनाये हुए थे। वहां पर हर परिवार का अपना कारखाना हुआ करता था और उद्योग के जरिये सैकड़ों लोगों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिला था। विगत वर्षों में मशीनीकरण के चलते ताम्र उद्योग के कारीगर टिक नहीं पाये। वर्तमान में अल्मोड़ा में ताम्र उद्योग से जुड़े लोगों की संख्या दहाई तक सिमट कर रह गयी है। हालांकि उनके पास पहले जैसा काम और अब नहीं रह गया है। देखने में आ रहा है कि ताम्र उद्योग से जुड़े अधिकतर कारीगर रोजगार की तलाश में पलायन कर चुके है और दूसरे व्यवसाय को अपना रहे हैं। ज्ञात हो कि अल्मोड़ा, बागेश्वर, पिथौरागढ़ व चमोली के कारीगरों द्वारा बनाये गये तांबे के बर्तनों की विशेष पहचान हुआ करती थी।

पहाड़ों में तांबों के बर्तनों की उपेक्षा
पहाड़ों में ही अब तांबे के बर्तनों की उपेक्षा होने लगी है। पहले हर घर में तांबे की गगरी होना शुभ माना जाता था। यहां तक की धार्मिक आयोजनों में तांबे के बर्तनों में ही खाना बनता था। इसके अलावा पराद, सुरई, पंचपाल, दीपदान, वाद्य यंत्र, रणसिंह, तुतरी, ढोल-नगाड़े, वाटर फिल्टर लैंप स्टैंड व घरों के सजावटी सामान ही अलग पहचान थी।

संरक्षण की आवश्यकता
वर्तमान में ताम्र उद्योग की स्थिति दिन पर दिन डाबाडोल होती जा रही है। सरकार ने ताम्र उद्योग के उन्नयन के लिए प्रयास नहीं किये तो यह उद्योग सिमट जायेगा। हालांकि राज्य सरकार यहां के कुटीर उद्योगों को संरक्षण देने की बात करती है। लेकिन उसे धरातल पर लागू करने के प्रयास नहीं किये जाते हैं।

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