समाचार सच, हल्द्वानी।
भारतीय संस्कृति में पितरों के प्रति श्रद्धा और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का विशेष महत्व है। इसी परंपरा को पर्यावरण संरक्षण से जोड़ते हुए श्री गिरिजा देवी सनातन सेवा समिति, हल्द्वानी एवं साथी संगठन ने श्राद्ध पक्ष में एक सराहनीय पहल की। पितरों की स्मृति में गौलापार स्थित कालीचौड़ के जंगलों में 300 फलदार पौधों का रोपण कर पर्यावरण संरक्षण और वन्यजीवों के लिए प्राकृतिक भोजन उपलब्ध कराने का संदेश दिया गया। इस अभियान में आम, अमरूद, लीची, बांस, पपीता, अनार, नींबू और जामुन सहित विभिन्न प्रजातियों के पौधे लगाए गए।
समिति के संरक्षक एवं प्रसिद्ध पर्यावरणविद् प्रोफेसर डॉ. एसडी तिवारी के निर्देशन में आयोजित इस कार्यक्रम का उद्देश्य केवल पौधे लगाना नहीं, बल्कि धार्मिक आस्था को प्रकृति संरक्षण के स्थायी अभियान से जोड़ना भी रहा। आयोजकों ने कहा कि जंगलों में फलदार पौधे विकसित होने से आने वाले समय में वन्यजीवों को प्राकृतिक आहार उपलब्ध कराने और हरित क्षेत्र को समृद्ध बनाने में मदद मिल सकती है।
श्राद्ध में पौधरोपण: पितरों को श्रद्धांजलि देने का अनूठा तरीका
श्री गिरिजा देवी सनातन सेवा समिति के सचिव डॉ. नवीन चन्द्र जोशी ने बताया कि वर्ष 2008-09 से वह श्राद्ध पक्ष में पितरों की स्मृति में जंगलों में फलदार पौधे लगाने का अभियान चला रहे हैं। शुरुआत में यह पहल सीमित स्तर पर शुरू हुई थी, लेकिन समय के साथ अनेक लोग इससे जुड़ते गए और अब विभिन्न स्थानों पर सहयोगियों के माध्यम से अभियान को आगे बढ़ाया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि इस पहल के माध्यम से पितरों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के साथ ही आने वाली पीढ़ियों के लिए हरित और बेहतर पर्यावरण तैयार करने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने वृक्षों के संरक्षण को पुण्यदायी कार्य बताते हुए लोगों से अधिक से अधिक पौधे लगाने और उनकी देखभाल करने की अपील की।
डॉ. जोशी ने बताया कि पौधों में तर्पण करने की परंपरा के माध्यम से लोगों को इस अभियान से जोड़ने और पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करने का प्रयास भी किया जाता है।
वन्यजीवों के लिए बनेगा प्राकृतिक भोजन का आधार
साथी संगठन के अध्यक्ष आनंद सिंह भाकुनी ने कहा कि श्राद्ध पक्ष में पितरों की स्मृति में फलदार पौधों का रोपण करना अत्यंत सराहनीय कार्य है। यह पहल धार्मिक भावनाओं के साथ-साथ प्रकृति और जीव-जंतुओं के प्रति संवेदनशीलता का भी संदेश देती है।
प्रसिद्ध पर्यावरण विशेषज्ञ मदन सिंह बिष्ट ने बताया कि पौधरोपण के दौरान स्थानीय जलवायु, मिट्टी और स्थान की अनुकूलता का ध्यान रखना जरूरी है। इसी आधार पर कालीचौड़ के जंगलों में उपयुक्त प्रजातियों के पौधे लगाए गए। उन्होंने कहा कि पौधों का सही स्थान पर रोपण और उनकी नियमित देखभाल ही उन्हें भविष्य में उपयोगी वृक्षों के रूप में विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
हरेला पर्व पर लगाए थे एक हजार पौधे, अब अभियान का दूसरा चरण
कार्यक्रम में मौजूद लक्ष्मण सिंह गोनिया ने बताया कि फलदार पौधरोपण अभियान का यह दूसरा चरण था। इससे पहले हरेला पक्ष में एक हजार पौधे लगाए गए थे। श्राद्ध पक्ष में 300 और फलदार पौधे रोपकर अभियान को आगे बढ़ाया गया।
उन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण जैसे कार्यों में सामाजिक संगठनों और आम लोगों की सहभागिता बेहद महत्वपूर्ण है। जब धार्मिक, सामाजिक और पर्यावरणीय उद्देश्यों को एक साथ जोड़कर काम किया जाता है, तो समाज में सकारात्मक बदलाव की संभावनाएं बढ़ती हैं।
सामाजिक संगठनों और कालीचौड़ मंदिर समिति का सहयोग
इस अभियान में साथी संगठन के साथ वरिष्ठ जन कल्याण समिति, हल्द्वानी का भी सहयोग रहा। श्री कालीचौड़ मंदिर समिति ने भी कार्यक्रम में सहयोग प्रदान किया। आयोजन में प्रसिद्ध विद्वान डॉ. चन्द्र बल्लभ बेलवाल, सुरेन्द्र सिंह बिष्ट, मोहन सिंह मेहरा, राजेन्द्र सिंह बोरा, पंत, जीवन चन्द्र जोशी, भुवन चन्द्र तिवारी सहित अन्य लोगों ने सहभागिता की।
कार्यक्रम के माध्यम से संदेश दिया गया कि पितरों की स्मृति में पौधरोपण जैसी पहल समाज को अपनी सांस्कृतिक परंपराओं से जोड़ने के साथ ही प्रकृति और वन्यजीवों के संरक्षण के प्रति जिम्मेदारी का एहसास कराती है। अब इन पौधों की उचित देखभाल और संरक्षण के जरिए इस प्रयास को दीर्घकालिक रूप से सफल बनाना महत्वपूर्ण होगा।

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