पितृ पक्ष श्राद्ध में कौए का क्यों है महत्व, इसलिए कौए को दिया जाता है आहार

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समाचार सच, अध्यात्म डेस्क। पितृपक्ष शुरू हो चुके हैं और ये छह अक्तूबर तक श्राद्ध चलेंगे। इस दौरान लोग अपने अपने पूर्वजों का श्राद्ध करेंगे। दिवंगत आत्माओं की शांति के लिए अनुष्ठान किए जाएंगे। ऐसे में लोग यज्ञ करने के बाद अपने पितृ को जल और अन्न का भोग कौओं के माध्यम से कराते हैं। ऐसी मान्यता है कि इन कौओं में पितृों की आत्मा विराजमान होती है। लेकिन देश में लगातार कौए की संख्या कम होने से पितृों को जल और अन्न का भोग लगाने में बाधा खड़ी हो रही है।

धर्माचार्य डॉ बांके बिहारी ने बताया कि श्राद्ध शुरू हो चुके हैं। ऐसे में लोग अपने पूवर्जों को याद करने के लिए यज्ञ करते हैं और अन्य जल का भोग कौए के माध्यम से कराते हैं। उन्होंने कहा कि हिंदू सनातन परंपरा में इसका काफी ज्यादा महत्व है। कौआ यम का प्रतीक होता है यानी कि यमराज। यमराज मृत्यु का देवता है। ऐसा कहा जाता है जो अगर कौआ अन्न खा ले तो यमराज खुश होते हैं और उनका संदेश उनके पूर्वजों तक पहुंच जाता है।

पितृ पक्ष में कौवे न मिलने से अधूरा रह रही पौराणिक मान्यता
पितृ पक्ष शुरू हो चुका है। लोगों ने अपने पूर्वजों का श्राद्ध व तर्पण करना शुरू कर दिया है। इस समय में कौवे का आना और भोजन ग्रहण करना शुभ प्रतीक माना जाता है लेकिन कई जगह तो कौवे भी अब न के बराबर नजर आते हैं। ऐसे में कहा जा सकता है कि आस्था के इस पर्व में अब पर्यावरण का असर देखने को मिल रहा है। एक दशक पहले जब घर की मुंडेर पर सुबह कौवा आकर कांव-कांव करता था तो यह माना जाता था कि घर पर कोई मेहमान आने वाला है। वहीं, पितृपक्ष में कौवों की अहमियत अचानक बढ़ जाती है, क्योंकि मान्यता है कि कौवे को निवाला दिए बिना पितृ संतुष्ट नहीं होते।

‘किसी भी पक्षी को खिला सकते हैं भोजन’
तृपक्ष में एक थाली कौवे, कुत्ते और गाय के लिए भी निकाली जाती है। अगर कौवे नहीं मिल रहे हैं तो किसी भी पक्षी को भोजन कराया जा सकता है, लेकिन कौवे को ही खिलाया जाए यही उत्तम होता हैं। गरुड़ पुराण में लिखा है कि कौवा यमराज का संदेश वाहक है। श्राद्ध पक्ष में कौवे को खाना खिलाने से यमलोक में पितर देवताओं को तृप्ति मिलती है। प्राचीन शास्त्रों के अनुसार, यम ने कौवे को वरदान दिया था कि तुम्हें दिया गया भोजन पूर्वजों की आत्मा को शांति देगा। तब से यह प्रथा चली आ रही है।

शास्त्रों के अनुसार, श्राद्ध करने के बाद जितना जरूरी ब्राह्मण को भोजन कराना होता है, उतना ही जरूरी कौवों को भोजन कराना भी होता है। माना जाता है कि कौवे इस समय में हमारे पितरों का रूप धारण करके हमारे पास उपस्थित रहते हैं। बदलते दौर में हो रहे औद्योगीकरण का असर पितृपक्ष में भी नजर आ रहा है।

‘प्राकृतिक तौर पर सफाईकर्मी हैं कौवे’
पर्यावरणविद समीरा सतीजा बताती हैं कि शहर में बढ़ती आबादी और घटते पेड़ों की संख्या का ही नतीजा है कि अन्य पक्षियों के साथ साथ अब कौवे भी नजर नहीं आते हैं। सेक्टर और कॉलोनियों में एक-दो पेड़ ही दिखते हैं, वो भी काफी दूरी पर होते हैं। जबकि कौवे घने पेड़ों में ही रहना पसंद करते हैं क्योंकि वे बड़ी संख्या में एक साथ रहते हैं। वहीं गाड़ियों के शोर के चलते भी इनकी संख्या शहर में कम होती नजर आ रही है। कौवे पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा हैं। उनके न होने से प्रकृति का संतुलन बिगड़ सकता है। कौवे प्राकृतिक तौर पर सफाईकर्मी हैं। वे छोटे कीड़ों के ही साथ ही प्रदूषण के कारकों को भी खा लेते हैं। इससे प्राकृतिक तौर पर कचरा प्रबंधन हो जाता है। कौवों के न होने से प्रदूषण की समस्या में और इजाफा होगा। इसके अलावा कौए फसलों-पेड़ों में लगने वाले कीटों को खाकर फसल की भी सुरक्षा करते हैं।

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