श्राद्ध पक्ष 2026: मातृ नवमी का श्राद्ध रविवार, 04 अक्टूबर को होगा

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समाचार सच, अध्यात्म डेस्क। पितृ पक्ष में नवमी तिथि का श्राद्ध विशेष रूप से मातृशक्ति और परिवार की दिवंगत महिला सदस्यों की स्मृति व शांति के लिए समर्पित होता है। इसे श्मातृ नवमीश्, श्नौमी श्राद्धश् या श्अविधवा श्राद्धश् के नाम से भी जाना जाता है। यह दिन माता, दादी, परदादी तथा परिवार की उन सभी दिवंगत महिलाओं के तर्पण के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है, जिनका निधन किसी भी पक्ष (शुक्ल या कृष्ण) की नवमी तिथि को हुआ हो या जिनकी मृत्यु सुहागिन अथवा अविवाहित अवस्था में हुई हो। वर्ष 2026 में मातृ नवमी का श्राद्ध रविवार, 04 अक्टूबर 2026 को रखा जाएगा।

नवमी तिथि का प्रारंभ: 04 अक्टूबर 2026 को प्रातः 05.51 बजे से
नवमी तिथि का समापन: 05 अक्टूबर 2026 को तड़के 03.53 बजे तक

श्राद्ध कर्म के शुभ समय
कुतुप मुहूर्त (सर्वश्रेष्ठ समय): पूर्वाह्न 11.46 बजे से दोपहर 12.33 बजे तक

रोहिणी मुहूर्त : दोपहर 12.33 बजे से 01.20 बजे तक
अपराह्न काल : दोपहर 01.20 बजे से अपराह्न 03.42 बजे तक

विशेष नोट: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्कुतुप कालश् में किया गया श्राद्ध एवं तर्पण सबसे अधिक फलदायी होता है। इस मुहूर्त में समर्पित की गई आहुतियां सीधे पितरों तक पहुंचती हैं।

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मातृ नवमी का विशेष धार्मिक महत्व
मातृशक्ति का सम्मान

सामान्यतः श्राद्ध उसी तिथि को किया जाता है जिस दिन किसी परिजन का निधन हुआ हो, परंतु नवमी तिथि विशेष रूप से परिवार की सभी दिवंगत माताओं, बहनों और सुहागिन स्त्रियों के तर्पण के लिए आरक्षित है।
अखंड सौभाग्य का वरदान
ऐसी मान्यता है कि मातृ नवमी पर विधि-विधान से पूजन व तर्पण करने पर दिवंगत माताएं प्रसन्न होकर परिवार की जीवित महिलाओं को अखंड सौभाग्य, समृद्धि और आरोग्य का आशीर्वाद देती हैं।
पितृ दोष से शांति
इस पावन दिन तर्पण करने से कुल में शांति का वास होता है और पितृ दोष का निवारण होता है।

मातृ नवमी श्राद्ध की प्रामाणिक एवं सरल विधि
स्मरण व ध्यान –
प्रातःकाल स्नान के पश्चात स्वच्छ वस्त्र धारण करें और एकाग्रचित्त होकर अपनी दिवंगत माताओं व पूर्वजों का ध्यान करें।
पिंडदान अर्पण – तिल, जौ, गुड़ और आटे से पिंड तैयार करें तथा उन्हें जल एवं भावपुष्पों के साथ पितरों को अर्पित करें।
त्रिवार तर्पण – हाथ में जल, काले तिल और कुश लेकर तीन बार तर्पण दें। तर्पण की यह क्रिया तीन बार दोहराना अत्यंत शुभ माना जाता है।
पंचबलि व जीवों की तृप्ति – पितरों के निमित्त तैयार सात्विक भोजन से गाय, कौवे, कुत्ते और अन्य जीवों के लिए अंश निकालें। मान्यता है कि इन जीवों के माध्यम से अर्पित भोजन पितरों को तृप्त करता है।
ब्राह्मण भोज व दान-दक्षिणा – इसके उपरांत योग्य ब्राह्मणों को आदरपूर्वक सात्विक भोजन कराएं और उन्हें अपनी क्षमतानुसार वस्त्र, अन्न एवं दक्षिणा देकर आशीर्वाद प्राप्त करें।
पारण – सभी धार्मिक अनुष्ठानों और दान के पश्चात स्वयं परिवार के सदस्यों के साथ प्रसाद ग्रहण करें।

पूर्ण सात्विकता व स्वच्छता – श्राद्ध के दिन घर में पूर्ण पवित्रता बनाए रखें और भोजन बनाते व पूजा करते समय मन को शांत व शुद्ध रखें।
समय का पालन – तर्पण और श्राद्ध कर्म सदैव निर्धारित कुतुप या अपराह्न मुहूर्त के भीतर ही संपन्न करें।
तामसिक वस्तुओं का त्याग – श्राद्ध के दिन लहसुन, प्याज, मांसाहार या किसी भी प्रकार की तामसिक वस्तुओं का प्रयोग पूरी तरह वर्जित है।
पर्याप्त जल से तर्पण – तर्पण करते समय जल की मात्रा पर्याप्त होनी चाहिए, ताकि तिल व जौ के साथ तर्पण सही विधि से हो सके।
श्रद्धा व सद्भाव –
श्राद्ध कर्म किसी दिखावे के लिए नहीं, बल्कि सच्चे मन और भक्ति भाव से करें, जिससे घर-परिवार पर पितरों की कृपा सदैव बनी रहे।

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