विश्व पर्यावरण दिवस विशेषः जब एक पहाड़ी महिला ने जंगलों के लिए बदल दी इतिहास की दिशा

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गौरा देवी और चिपको आंदोलन की वह गाथा, जिसने दुनिया को सिखाया प्रकृति बचाने का असली अर्थ

समाचार सच, देहरादून। आज जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, ग्लेशियरों के पिघलने, बढ़ते तापमान और पर्यावरणीय संकटों को लेकर चिंतित है, तब उत्तराखंड की धरती से उठी एक महिला की आवाज फिर प्रासंगिक हो उठती है। यह कहानी है चमोली जिले के रैणी गांव की निवासी गौरा देवी की, जिन्होंने पांच दशक पहले जंगलों को बचाने के लिए ऐसा साहस दिखाया कि उनका संघर्ष विश्वभर में पर्यावरण संरक्षण की मिसाल बन गया।

जंगल नहीं, जीवन का आधार थे पहाड़ के वन
हिमालयी क्षेत्रों में जंगल केवल हरियाली नहीं थे, बल्कि ग्रामीण जीवन की रीढ़ थे। पशुओं के लिए चारा, ईंधन के लिए लकड़ी, पानी के स्रोत और दैनिक जरूरतों का बड़ा हिस्सा इन्हीं वनों से जुड़ा था। विशेष रूप से महिलाओं का जीवन जंगलों के साथ गहरे रिश्ते में बंधा हुआ था।

ऐसे समय में जब बाहरी ठेकेदारों को बड़े पैमाने पर पेड़ों के दोहन की अनुमति दी जा रही थी, स्थानीय लोगों को अपने ही प्राकृतिक संसाधनों से दूर किया जा रहा था। यही असंतोष आगे चलकर एक बड़े जनआंदोलन का कारण बना।

संसाधनों पर अधिकार की लड़ाई से जन्मा आंदोलन
पर्यावरणविद् राजीव नयन बहुगुणा बताते हैं कि चिपको आंदोलन की शुरुआत केवल पर्यावरण बचाने के उद्देश्य से नहीं हुई थी। इसके पीछे स्थानीय समुदायों के अधिकारों का प्रश्न भी जुड़ा था।

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उनके अनुसार, उस समय अंगू प्रजाति के पेड़ अत्यंत मूल्यवान माने जाते थे और उनकी लकड़ी विभिन्न औद्योगिक उपयोगों में लाई जाती थी। लेकिन जब इन पेड़ों के आवंटन की बात आई तो स्थानीय सहकारी संस्थाओं को सीमित संख्या में पेड़ दिए गए, जबकि बड़े व्यापारिक समूहों को भारी संख्या में कटान की अनुमति मिल गई। इससे ग्रामीणों में गहरा असंतोष पैदा हुआ और विरोध की नींव पड़ी।

जब पुरुष गांव में नहीं थे, महिलाओं ने संभाली कमान
साल 1973 में रैणी गांव के जंगलों में पेड़ काटने के लिए ठेकेदारों और मजदूरों का दल पहुंचा। संयोगवश उस समय गांव के अधिकांश पुरुष बाहर गए हुए थे। ऐसे में गौरा देवी ने गांव की महिलाओं को संगठित किया और सीधे जंगल की ओर रवाना हो गईं।

जंगल पहुंचकर महिलाओं ने पेड़ों के चारों ओर घेरा बना लिया। उन्होंने साफ शब्दों में संदेश दिया कि यदि पेड़ काटने हैं तो पहले उन्हें काटना होगा। महिलाओं के इस अदम्य साहस के आगे ठेकेदारों को पीछे हटना पड़ा।
यहीं से उस ऐतिहासिक संघर्ष की शुरुआत हुई जिसे बाद में पूरी दुनिया ने “चिपको आंदोलन” के नाम से जाना।

“जंगल हमारा मायका है”
राजीव नयन बहुगुणा बताते हैं कि गौरा देवी अक्सर कहा करती थीं- “जंगल हमारा मायका है।”
पर्वतीय समाज में मायका केवल एक घर नहीं, बल्कि सुरक्षा, अपनापन और जीवन का प्रतीक माना जाता है। पहाड़ की महिलाओं के लिए जंगल भी उसी भावनात्मक संबंध का हिस्सा थे। उनकी रोजमर्रा की जरूरतें और जीवन का संतुलन इन्हीं वनों पर निर्भर था। इसलिए जंगलों पर संकट को उन्होंने अपने अस्तित्व पर संकट के रूप में देखा।

लोकगीतों ने आंदोलन को जन-जन तक पहुंचाया
रैणी से शुरू हुआ यह आंदोलन जल्द ही पूरे उत्तराखंड में फैल गया। सामाजिक कार्यकर्ताओं, स्थानीय समुदायों और जनकवियों ने इसे नई ताकत दी।

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लोक कवि घनश्याम रतूड़ी ‘सैलानी’ गांव-गांव जाकर गीतों के माध्यम से लोगों को जागरूक करते थे। उनके गीतों ने आंदोलन को व्यापक जनसमर्थन दिलाया और पर्यावरण संरक्षण का संदेश दूर-दूर तक पहुंचाया।
धीरे-धीरे चिपको आंदोलन केवल उत्तराखंड का आंदोलन नहीं रहा, बल्कि वैश्विक स्तर पर पर्यावरणीय चेतना का प्रतीक बन गया।

बदली नीतियां, मजबूत हुए कानून
चिपको आंदोलन का असर केवल जंगलों को बचाने तक सीमित नहीं रहा। इसके बाद हिमालयी क्षेत्रों में व्यावसायिक कटान पर कई प्रतिबंध लगाए गए और वन संरक्षण से जुड़े कानूनों को मजबूती मिली।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस आंदोलन ने भारत में पर्यावरणीय मुद्दों को राष्ट्रीय बहस का विषय बनाया। वन संरक्षण अधिनियम जैसे महत्वपूर्ण कदमों के पीछे भी इस जनचेतना की बड़ी भूमिका रही।

आधी सदी बाद भी प्रासंगिक है गौरा देवी का संदेश
विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर गौरा देवी की कहानी केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है।

उन्होंने दुनिया को समझाया कि जंगल सिर्फ लकड़ी का भंडार नहीं होते। वे मिट्टी, पानी, हवा और जीवन का आधार हैं। विकास और प्रकृति के बीच संतुलन बनाए बिना भविष्य सुरक्षित नहीं हो सकता।

शायद यही कारण है कि गौरा देवी केवल एक नाम नहीं, बल्कि पर्यावरणीय चेतना का प्रतीक बन चुकी हैं। जब-जब प्रकृति संरक्षण की बात होगी, रैणी की उस साहसी महिला की कहानी प्रेरणा देती रहेगी, जिसने अपने साहस से इतिहास की दिशा बदल दी।

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